व्रत और त्यौहार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
व्रत और त्यौहार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सोमवार, 2 सितंबर 2019
गणेश चतुर्थी 2019 शुभ मुहूर्त ,महत्व और पूजा विधि
गणेश चतुर्थी 2019 शुभ मुहूर्त ,महत्व और पूजा विधि
साल 2019 में गणेश चतुर्थी यानी गणेश भगवान का जन्मोत्सव 2 सितंबर दिन सोमवार को मनाया जायेगा। इस दिन कई लोग अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना करते हैं और 9 दिनों तक उसका पूजन करने के बाद 10वें दिन उस मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। इस बार विसर्जन की तारीख 12 सितंबर है। मान्यता है कि भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को सोमवार में मध्याह्न काल में, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था। इसलिए गणेश चतुर्थी के दिन मध्याह्न काल यानी दोपहर के समय भगवान गणेश की पूजा करना शुभ माना गया है।
2 सितंबर के दिन मध्याह्न गणेश पूजा सुबह 11:04 बजे से दोपहर 1:37 तक रहेगी। पूजा की अवधि 2 घंटे 32 मिनट तक रहेगी। इसके बाद चतुर्थी तिथि का मुहुर्त आरंभ सुबह 4 बजकर 56 मिनट से शुरू होगा।
तो वहीं चतुर्थी तिथि समाप्ति का मुहूर्त 3 सितंबर 2019 रात 1:53 मिनट तक रहेगा।
गणेश चतुर्थी शुभ मुहूर्त
2 सितंबर के दिन मध्याह्न गणेश पूजा सुबह 11:04 बजे से दोपहर 1:37 तक रहेगी। पूजा की अवधि 2 घंटे 32 मिनट तक रहेगी। इसके बाद चतुर्थी तिथि का मुहुर्त आरंभ सुबह 4 बजकर 56 मिनट से शुरू होगा।
तो वहीं चतुर्थी तिथि समाप्ति का मुहूर्त 3 सितंबर 2019 रात 1:53 मिनट तक रहेगा।
गणेश चतुर्थी का महत्व
गणेश चतुर्थी का दिन हिंदू धर्म के लोगों के लिए खास महत्व रखता है। इसलिए भारत में भगवान गणेश के जन्मोत्सव को बड़े ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है। खासतौर पर महाराष्ट्र राज्य में इस दिन अलग ही रौनक देखने को मिलती है। यहां गणेश चतुर्थी के पर्व को गणेशोत्सव के नाम से जाना जाता है। कई जगह लोग गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं और 9 दिनों तक उसका पूजन करने के बाद 10वें दिन भगवान गणेश का विसर्जन किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से भगवान गणेश अपने भक्तों के सारे कष्ट दूर कर देते हैं।
गणेश चतुर्थी पूजा विधि
गणेश चतुर्थी के दिन घर पर भगवान गणेश की प्रतिमा या मूर्ति लेकर आएं। गणपति की मूर्ति के नीचे लाल कपड़ा बिछाएं। और सही दिशा में इनकी स्थापना करें। उसके बाद भगवान गणेश को दीपक दिखाएं और भोग में मोदक के लड्डू चढाएं। शाम के समय भगवान गणेश की पूजा करने के बाद उनकी आरती उतारें। भगवान गणेश की 9 दिनों तक ऐसे ही पूजा करें। फिर दसवें दिन उनकी विधि विधान से पूजा कर उनकी प्रतिमा का विसर्जन कर दें।
शुक्रवार, 30 अगस्त 2019
हरतालिका तीज 2019 - हरतालिका तीज व्रत 1 या 2 सितंबर जानें सही तिथि मुहूर्त
हरतालिका तीज 2019 - हरतालिका तीज व्रत 1 या 2 सितंबर जानें सही तिथि मुहूर्त
सौभाग्य का व्रत हरतालिका तीज भाद्र शुक्ल तृतीया तिथि को किया जाता है। भगवान शिव और पार्वती को समर्पित इस व्रत को लेकर इस बार उलझन की स्थिति बनी हुई है। व्रती इस उलझन में हैं कि उन्हें किस दिन यह व्रत करना चाहिए। दरअसल इस उलझन की वजह यह है कि इस साल पंचांग की गणना के अनुसार तृतीया तिथि का क्षय हो गया है यानी पंचांग में तृतीया तिथि का मान ही नहीं है।
1 सितंबर को सूर्योदय द्वितीया तिथि में होगा जो 8 बजकर 27 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। इसके बाद से तृतीया यानी तीज शुरू हो जाएगी और अगले दिन यानी 2 सितंबर को सूर्योदय से पूर्व ही सुबह 4 बजकर 57 मिनट पर तृतीया समाप्त होकर चतुर्थी शुरू हो जाएगी।
हरतालिका तीज व्रतियों के लिए उलझन की बात यह है कि उन्हें व्रत किस दिन करना चाहिए। आपको बता दें कि इस विषय पर ना सिर्फ व्रती बल्कि ज्योतिषशास्त्री और पंचांग के जानकर भी दो भागों में बंटे हुए हैं। एक मत के अनुसार हरतालिका तीज का व्रत 1 सितंबर को करना शास्त्र सम्मत होगा क्योंकि यह व्रत हस्त नक्षत्र में किया जाता है जो एक सितंबर को है। 1 सितंबर को पूरे दिन तृतीया तिथि होगी। संध्या पूजन के समय भी तृतीया तिथि रहेगी जिससे व्रत के लिए 1 सितंबर का दिन ही सब प्रकार से उचित है। 2 तारीख को सूर्योदय चतुर्थी तिथि में होने से इस दिन चतुर्थी तिथि का मान रहेगा ऐसे में तृतीया तिथि का व्रत मान्य नहीं होगा।
2 सितंबर को हरतालिका तीज को उचित मानने वाले विद्वानों का तर्क है कि शास्त्रों में चतुर्थी तिथि व्याप्त तृतीया तिथि को सौभाग्य वृद्धि कारक माना गया है। इनके अनुसार ग्रहलाघव पद्धति से बने पंचांग के अनुसार 8 बजकर 58 मिनट तक तृतीया तिथि रहेगी। इसके बाद चतुर्थी तिथि हो जाएगी। हरतालिका व्रत में एक नियम यह भी है कि हस्त नक्षत्र में व्रत करके चित्रा नक्षत्र में व्रत का पारण करना चाहिए। इस लिहाज से 2 सितंबर को तीज का व्रत रखना उचित और सौभाग्य वृद्धि कारक होगा। इन स्थितियों इस साल 2 दिन हरतालिका तीज का व्रत रखा जा सकता है।
हरतालिका तीज व्रत पूजन मुहूर्त
जो व्रती 1 सितंबर को हरतालिका तीज का व्रत रख रहे हैं उनके लिए पूजन का शुभ मुहूर्त शाम में 6 बजकर 15 मिनट से 8 बजकर 58 मिनट तक है।
2 सितंबर को व्रत रखने वालों को सूर्योदय से 2 घंटे के अंदर ही तीज का पूजन कर लेना होगा। इनके पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 8 बजकर 58 मिनट तक है।
बुधवार, 17 जुलाई 2019
सावन में सोमवार का व्रत रखें, तो बरतें ये सवाधानियां, व्रत में क्या खाएं ,क्या न खाएं
सावन में सोमवार का व्रत रखें, तो बरतें ये सवाधानियां, व्रत में क्या खाएं ,क्या न खाएं
सावन में सोमवार का व्रत रखने से जुड़ी बहुत सी मान्यताएं हैं, लोगों का मानना है कि श्रावण सोमवार के व्रत रखने से अच्छा और मनचाहा जीवनसाथी मिलता है. सावन के दौरान रखे जाने वाले इन व्रतों को सावन के चार सोमवार व्रत के तौर पर जाना जाता है. इस सावन का पहला सोमवार 17 जुलाई को होगा. सोमवार के व्रत खास तौर पर कुवांरी कन्याओं के लिए होता है, क्योंकि इसे रखने से मनचाहा वर मिलने की मान्यता है. व्रत रखने का मतलब है पूरे दिन अन्न न लेना. ऐसे मे सेहत से जुड़ी कई परेशानियां हो सकती है. अचानक से अपने रोजमर्रा के आहार में बदलाव करना और कम आहार लेना आपकी सेहत के लिए कई मायनों में खतरनाक हो सकता है. ऐसे में व्रत के दौरान अपनी सेहत से जुड़ी सवाधानियां बरतना भी जरूरी है, तो चलिए हम आपको बताते हैं कि कैसे आप भक्ति और सेहत का संतुलन बना सकते हैं-
चार सोमवार के व्रत रखते हुए डाइट टिप्स
व्रत के दौरान कुछ लोग एक समय का खाना खाते हैं, तो कई लोग पूरा दिन फलहाल पर ही हैं. इस दौरान ख्याल रखा जाना चाहिए कि कम खाना या भूखा रहना आपके स्वास्थ्य को किसी तरह से हानि न पहुंचाए. व्रत रखते समय कई बातों का ध्यान रखने की जरूरत है जैसे-
- इस बात का ध्यान रखें कि हर दिन आपके शरीर को जरूरी मात्रा में पोषक तत्व मिलें.
- खाली पेट न रहें और ज़्यादा से ज़्यादा तरह पदार्थ लेते रहें. ऐसा करने से शरीर में ऊर्जा बनी रहेगी और साथ ही डिहाइड्रेशन से भी बचे रहेंगे.
सावन 2019 में अगर आप सोमवार के व्रत रख रहे हैं तो डाइट में फलों को शामिल करें.
व्रत में क्या न खाएं
- पुराना बचा कूट्टू या सिंघाड़े का आटा इस्तेमाल न करें. यह कुछ समय बात खराब हो जाता है. ऐसे में इसे खाने से डायरिया होने का खतरा बढ़ जाता है.
- बर्फी, लड्डू और फ्राइड आलू जैसी तली और अत्यधिक चीनी वाली चीजों को खाने से बचें.
- अगर आप ज्यादा तला-भुना, मीठा या बिना नमक का खाना ले रहे हैं तो यह आपको ब्लडप्रेशर से जुड़ी समस्या दे सकता है.
- तला-भुना खाना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है. यह वजन बढ़ाने का काम कर सकता है या शुगर को भी प्रभावित कर सकता है.
- इस मौसम में तला-भुना खाने से बचें. बारिश के मौसम में यह संक्रमण या अपच की समस्या पैदा कर सकती है.
- खाली पेट रहने से एसिडिटी हो सकती है, ऐसे में ठंडा दूध लें और थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ खाते रहें.
- अगर आपको डायबिटीज की शिकायत है, तो इस बात का खास ध्यान रखें कि आप ज्यादा देर तक खाली पेट न रहें. कुछ न कुछ खाते रहें और भरपूर पानी पिएं.
व्रत में क्या खाएं
- व्रत के दौरान क्योंकि आप अनाज नहीं खाते इसलिए जरूरी है कि आप संतुलित भोजन लें.
- अगर आप सिर्फ फ्रूट्स खाते हैं और पानी कम पीते हैं तो कब्ज या शारीरिक कमजोरी महसूस हो सकती है.
- कुट्टू के आटे की रोटी या इडली भी आपके स्वाद और सेहत के लिए अच्छी साबित होगी.
- व्रत में खाए जाने वाले सामक के चावल आप पका सकते हैं अगर थोड़ा स्वाद भी पाना चाहते हैं तो इससे बना डोसा खा सकते हैं.
- लौकी, कद्दू या खीरे का रायता आपके खाने में एड ऑन होगा.
- आप खुद को एनर्जी देने के लिए लस्सी, मिल्करशेक, जूस वगैरह ले सकते हैं.
- जब भूख ज्यादा लगी हो तो ड्राई फ्रूट खा लें.
सावन के सोमवार को करें ये उपाय, प्रसन्न होते हैं भगवान शिव और करते हैं हर इच्छा पूरी
सावन के सोमवार को करें ये उपाय, प्रसन्न होते हैं भगवान शिव और करते हैं हर इच्छा पूरी
भगवान शिव की भक्ति और पूजा अर्चना का प्रमुख माह सावन बुधवार 20 जुलाई से शुरू हो रहा है। वैसे तो पूरे सावन माह में 'बम बम भोले' की जयकार गूंजती रहती है लेकिन इस माह के सोमवार को भगवान शिव के अभिषेक का विशेष महत्व होता है।
सावन के महीने में सोमवार के दिन श्रद्धालु शिवालयों में जाकर भोलेनाथ की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। श्रावण के सोमवार को शिव की आराधना को सर्वसुलभ माना गया है। आषाढ़ की पूर्णिमा यानि गुरू पूर्णिमा के बाद श्रावण माह की शुरुआत हो जाएगी और इस महीने में प्रति सोमवार को शिव की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। पहले सोमवार से लेकर प्रत्येक सोमवार को शिवपुराण के ये छोटे-छोटे उपाय कर सकते हैं। आपकी हर इच्छा पूरी जीवन के संहारक भगवान शिव को मात्र जल अर्पित कर मन से की गई आराधना उनको खुश करने के लिए बहुत है। इस वजह से उन्हें भोलेनाथ बाबा भी कहा जाता है।
भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद पाने के लिए इसी तरह के कुछ छोटे और अचूक उपायों के बारे में शिवपुराण में भी लिखा हुआ है। ये उपाय इतने बेहद ही आसान भी हैं।
शिवपुराण में हर समस्या के समाधान हेतु एक अलग उपाय बताया गया है।
शिवपुराण अनुसार, इन उपायों से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव और करते हैं हर इच्छा पूरी :-
- सावन के महीने में रोज 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ऊं नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढाने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।
- घर में अगर किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो सावन के महीने में रोज सुबह घर में गोमूत्र का छिड़काव करें एंव गुग्गल का धूप दें।
- यदि आपके विवाह में अड़चन है तो सावन में रोज शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं।
- सावन में रोज नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाने से जीवन में सुख-समृद्धि आएगी एंव मन प्रसन्न रहेगा।
- सावन में गरीबों को भोजन कराने से आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।
- सावन में रोज सुबह किसी शिव मंदिर में जल अभिषेक कर काले तिल अर्पण करें और मन ही मन में ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इस उपाय से मन को शांति मिलेगी।
- किसी नदी या तालाब जाकर आटे की गोलियां मछलियों को खिलाते समय मन ही मन में भगवान शिव का ध्यान करते रहने से धन प्राप्ति होती है।
सावन सोमवार के दिन सभी कष्टों से मुक्ति पाने के लिए करे ये खास उपाय
सावन सोमवार के दिन सभी कष्टों से मुक्ति पाने के लिए करे ये खास उपाय
भगवान शिव की पूजा और साधना कृपा बरसाने वाली होती है। शिव जी को प्रसन्न करने के लिये पार्थिव लिंग पूजन का विशेष महत्व होता है। कलयुग में कूष्माण्ड ऋषी के पुत्र मंडप नें पार्थिव पूजन प्रारम्भ किया। शिव महापुराण के अनुसार पार्थिव पूजन से धन, धान्य, आरोग्य और पुत्र की प्राप्ति होती है। पार्थिव पूजन से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
शिव जी की अराधना के लिए पार्थिव पूजन सभी लोग कर सकते हैं, फिर चाहे वह पुरुष हो या फिर महिला। यह सभी जानते हैं कि शिव कल्याणकारी हैं। जो पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधिवत पूजन अर्चना करता है, वह दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है।
शिवपुराण में लिखा है कि पार्थिव पूजन सभी दुःखों को दूर करके सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है। यदि प्रतिदिन पार्थिव पूजन किया जाय तो इस लोक तथा परलोक में भी अखण्ड शिव भक्ति प्राप्त होती है। आइये इस विषय पर जाने-माने ज्योतिष के जानकार सुजीत जी महाराज से जानते हैं कि पार्थिव पूजा कैसे करनी चाहिए।
जानें, कैसे करते हैं पार्थिव पूजन और इससे क्या लाभ मिलते हैं
पार्थिव पूजन करने से पहले पार्थिव शिवलिंग बनाइए। इसको बनाने के लिए किसी पवित्र नदी या तालाब की मिट्टी लें। फिर उस मिट्टी को पुष्प चंदन इत्यादि से संशोधित करें। मिट्टी में दूध मिलाकर शोधन करें।
शिवलिंग बनाने के बाद करें इन देवों की पूजा
शिवलिंग बनाने के बाद श्री गणेश जी, श्री विष्णु जी, नव ग्रह और माता पार्वती आदि का आह्वान करना चाहिए। फिर विधिवत तरीके से षोडशोपचार करना चाहिए।
परम ब्रम्ह मानकर करें पूजा और ध्यान
पार्थिव बनाने के बाद उसे परम ब्रम्ह मानकर पूजा और ध्यान करें। पार्थिव शिवलिंग समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। सपरिवार पार्थिव बनाकर शास्त्रवत विधि से पूजन करने से परिवार सुखी रहता है।
रोग से पीड़ित लोग करें महामृत्युंजय जाप
पार्थिव के समक्ष समस्त शिव मंत्रों का जप किया जा सकता है। रोग से पीड़ित लोग महामृत्युंजय मंत्र का जप भी कर सकते हैं। दुर्गासप्तशती के मंत्रों का जप भी किया जा सकता है। पार्थिव के विधिवत पूजन के बाद उनको श्री राम कथा भी सुनाकर प्रसन्न कर सकते हैं।
सावन महीना 2019 - 17 जुलाई से शुरू हो रहा है पवित्र सावन का महीना, जानें सोमवार व्रत, कथा और महत्व
सावन महीना 2019 - 17 जुलाई से शुरू हो रहा है पवित्र सावन का महीना, जानें सोमवार व्रत, कथा और महत्व
साल 2019 में सावन का महीना बेहद खास है. हालांकि इस महीने की शुरुआत होने में अभी कर्ई दिन बाकी हैं. इस बार सावन के महीन की शुरुआत 17 जुलाई से हो रही है. सावन के महीने की शुरुआत से ही व्रत और त्योहारों की भी शुरुआत हो जाती है. सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है. सभी शिव भक्त इस दौरान भगवान शंकर की पूरे महीने पूजा, आराधना करते हैं. आइए हम आपको बताते हैं कि सावन के महीने भगवान शिव की पूजा किस तरह से करें.
पौराणिक कथाओं के अनुसार जो व्यक्ति सावन के पवित्र महीने में पूरे मनोयोग से भगवान शिव की उपासना करता है उसकी सभी मनोकामनाएं भगवान शंकर पूरी करते हैं. इसी सावन महीने में कावड़ यात्रा भी शुरू होती है जिसके तहत लाखों की संख्या में श्रद्धालु पैदल चलकर हरिद्वार शिवलिंग पर जल चढ़ाने जाते हैं.
हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक सावन का महीना भगवान शिव के अलावा मां पार्वती की पूजा आराधना के लिए भी सर्वेत्तम है. ऐसी मान्यता है कि जो भक्त पूरे मन से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करता है उस पर शिव पार्वती की असीम अनुकंपा होती है. जहां शादीशुदा महिलाएं अपने आगामी जीवन को सुखमय बनाने के लिए उनकी प्रार्थना करती हैं वहीं दूसरी तरफ कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की प्राप्ति हेतु शिव पार्वती की पूजा करती हैं. इसके अलावा नाग पंचमी और रक्षाबंधन जैसे त्योहार भी सावन में मनाए जाते हैं.
इस साल यानी 2019 में सावन का पहला सोमवार 22 जुलाई को पड़ेगा. वैसे सोमवार का दिन भगवान शिव का माना जाता है. अगर सावन का महीना हो और उसमें सोमवार का दिन हो तो इससे बेहतर दिन कोई हो नहीं सकता. देशभर में स्थित शिव मंदिरों में सावन के सोमवार वाले दिन भक्तों की भीड़ उमड़ती है. वहीं इस साल सावन का आखिरी दिन 15 अगस्त को होगा.
मंगलवार, 26 मार्च 2019
जानें, कब है शीतला अष्टमी और क्या है पूजा विधि?
जानें, कब है शीतला अष्टमी और क्या है पूजा विधि?
शीतला मां का उल्लेख सर्वप्रथम स्कन्दपुराण में मिलता है, इनको अत्यंत सम्मान का स्थान प्राप्त है. इनका स्वरूप अत्यंत शीतल है और रोगों को हरने वाला है. इनका वाहन है गधा, तथा इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते हैं. मुख्य रूप से इनकी उपासना गरमी के मौसम में की जाती है. इनकी उपासना का मुख्य पर्व "शीतला अष्टमी" है.
शीतला मां का उल्लेख सर्वप्रथम स्कन्दपुराण में मिलता है, इनको अत्यंत सम्मान का स्थान प्राप्त है. इनका स्वरूप अत्यंत शीतल है और रोगों को हरने वाला है. इनका वाहन है गधा, तथा इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते हैं. मुख्य रूप से इनकी उपासना गर्मी के मौसम में की जाती है. इनकी उपासना का मुख्य पर्व "शीतला अष्टमी" है. इस बार शीतला अष्टमी का पर्व 28 मार्च को मनाया जाएगा.
माँ शीतला के स्वरूप से क्या प्रदर्शित होता है?
- कलश, सूप , झाड़ू और नीम के पत्ते इनके हाथ में रहते हैं.
-यह सारी चीज़ें साफ़ सफाई और समृद्धि की सूचक है.
-इनको शीतल और बासी खाद्य पदार्थ चढ़ाया जाता है, जिसको बसौड़ा भी कहते हैं.
-इनको चांदी का चौकोर टुकड़ा जिस पर उनका चित्र उकेरा हो, अर्पित करते हैं.
-अधिकांशतः इनकी उपासना बसंत तथा ग्रीष्म में होती है, जब रोगों के संक्रमण की सर्वाधिक संभावनाएँ होती हैं.
शीतलाष्टमी का वैज्ञानिक आधार क्या है? इसे मनाने के लाभ क्या हैं?
-चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, तथा आषाढ़ की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतलाष्टमी के रूप में मनाया जाता है.
- रोगों के संक्रमण से आम व्यक्ति को बचाने के लिए शीतला अष्टमी मनाई जाती है.
- इस दिन आखिरी बार आप बासी भोजन खा सकते हैं, इसके बाद से बासी भोजन का प्रयोग बिलकुल बंद कर देना चाहिए.
- अगर इस दिन के बाद भी बासी भोजन किया जाय तो स्वास्थ्य की समस्याएँ आ सकती हैं.
- यह पर्व गरमी की शुरुआत पर पड़ता है यानी गरमी में आप क्या प्रयोग करें, इस बात की जानकारी आपको मिल सकती है.
- गरमी के मौसम में आपको साफ-सफाई, शीतल जल और एंटीबायोटिक गुणों से युक्त नीम का विशेष प्रयोग करना चाहिए.
बच्चों को बीमारी से बचाने के लिए किस प्रकार माँ शीतला की उपासना करें?
- माँ शीतला को एक चांदी का चौकोर टुकड़ा अर्पित करें
- साथ में उन्हें खीर का भोग लगाएं
- बच्चे के साथ माँ शीतला की पूजा करें
- चांदी का चौकोर टुकड़ा लाल धागे में बच्चे के गले में धारण करवाएं
शीतला अष्टमी, बसौड़ा 2019 - जानें क्यों मां को चढ़ाया जाता है बासी प्रसाद?
शीतला अष्टमी, बसौड़ा 2019 - जानें क्यों मां को चढ़ाया जाता है बासी प्रसाद?
शीतला अष्टमी या बसौड़ा के व्रत का खास महत्व है. इस दिन मां शीतला को बासी भोजन का प्रसाद अर्पण किया जाता है |
शीतला अष्टमी या बसौड़ा का व्रत 28 मार्च, गुरुवार को है.
व्रत विधि
इस उपवास में घर पर चूल्हा नहीं जलता. माता के प्रसाद के लिए व परिवार जनों के भोजन के लिए, एक दिन पहले ही सब कुछ पकाया जाता है. माता को सफाई काफी पसंद है इसलिए सब कुछ साफ-सुथरा होना बेहद आवश्यक है.
इस उपवास में घर पर चूल्हा नहीं जलता. माता के प्रसाद के लिए व परिवार जनों के भोजन के लिए, एक दिन पहले ही सब कुछ पकाया जाता है. माता को सफाई काफी पसंद है इसलिए सब कुछ साफ-सुथरा होना बेहद आवश्यक है.
इस दिन प्रात: काल उठें. स्नान करें. व्रत का संकल्प लेकर विधि-विधान से मां शीतला की पूजा करें. पहले दिन बने हुए यानि बासी भोजन का भोग लगाएं. साथ ही शीतला सप्तमी-अष्टमी व्रत की कथा सुनें.
जानें क्यों मां को चढ़ाया जाता है बासी प्रसाद?
इस दिन के बाद से बासी खाना खाने की मनाही होती है. क्योंकि इस व्रत के बाद गर्मियां शुरू हो जाती हैं, इसलिए बासी भोजन से बीमार होने का खतरा रहता है.
शीतला सप्तमी 2019 का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और कथा
शीतला सप्तमी 2019 का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और कथा
हर साल होली के सातवें दिन शीतला सप्तमी मनाई जाती है. इस दिन महिलाएं सुबह अंधेरे में रात के बने मीठे चावल, हल्दी, चने की दाल और लोटे में पानी लेकर होलिका दहन वाली जगह पर जाकर पूजा करती हैं. इस पूजा को उत्तर भारत के कई जगहों पर बासौड़ा या बसोरा (Basoda) भी कहा जाता है. इस बार बासौड़ा या शीतला सप्तमी 27 मार्च को मनाई जा रही है. जानिए इस पूजा से जुड़ी सभी खास बातें...
शीतला सप्तमी का शुभ मुहूर्त
27 मार्च सुबह 06:28 से 18:37 तक.
चावल का प्रसाद
शीतला सप्तमी के दिन शीतला माता की पूजा के समय उन्हें खास मीठे चावलों का भोग चढ़ाया जाता है. ये चावल गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं. इन्हें पूजा से पहले रात में बनाया जाता है. इसी प्रसाद को घर में सभी सदस्यों को खिलाया जाता है. इस दिन घर में सुबह के समय कुछ और नहीं बनता.
शीतला सप्तमी के दिन शीतला माता की पूजा के समय उन्हें खास मीठे चावलों का भोग चढ़ाया जाता है. ये चावल गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं. इन्हें पूजा से पहले रात में बनाया जाता है. इसी प्रसाद को घर में सभी सदस्यों को खिलाया जाता है. इस दिन घर में सुबह के समय कुछ और नहीं बनता.
शीतला सप्तमी की पूजा विधि
1. हर पूजा की तरह इसमें भी सुबह पहले स्नान करें.
2. इसके बाद शीतला माता की पूजा करें.
3. स्नान और पूजा के वक्त 'हृं श्रीं शीतलायै नमः' का उच्चारण करते रहें.
4. माता को भोग में रात के बने गुड़ वाले चावल चढ़ाएं.
5. व्रत में इन्हीं चावलों को खाएं.
शीतला सप्तमी का महत्व
मान्यता है कि शीतला माता ये व्रत रखने से बच्चों की सेहत अच्छी बनी रहती है. उन्हें किसी भी प्रकार का बुखार, आंखों के रोग और ठंड से होने वाली बीमारियां नहीं होती. इसके अलावा यह भी माना जाता है शीतला सप्तमी के बाद बासी भोजन नहीं किया जाता है. यह बासी भोजन का खाने का आखिरी दिन होता है. इसके बाद मौसम गर्म होता है इसीलिए ताज़ा खाना खाया जाता है.
शीतला सप्तमी की कथा
हिंदू धर्म में प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक दिन बूढ़ी औरत और उसकी दो बहुओं ने शीतला माता का व्रत रखा. मान्यता के मुताबिक इस व्रत में बासी चावल चढ़ाए और खाए जाते हैं. लेकिन दोनों बहुओं ने सुबह ताज़ा खाना बना लिया. क्योंकि हाल ही में दोनों की संताने हुई थीं, इस वजह से दोनों को डर था कि बासी खाना उन्हें नुकसान ना पहुंचाए. सास को ताज़े खाने के बारे में पता चला तो वो बहुत नाराज़ हुई. कुछ क्षण ही गुज़रे थे, कि पता चला कि दोनों बहुओं की संतानों की अचानक मृत्यु हो गई. इस बात को जान सास ने दोनों बहुओं को घर से बाहर निकाल दिया.
शवों को लेकर दोनों बहुएं घर से निकल गईं. बीच रास्ते वो विश्राम के लिए रूकीं. वहां उन दोनों को दो बहनें ओरी और शीतला मिली. दोनों ही अपने सिर में जूंओं से परेशान थी. उन बहुओं को दोनों बहनों को ऐसे देख दया आई और वो दोनों के सिर को साफ करने लगीं. कुछ देर बाद दोनों बहनों को आराम मिला, आराम मिलते ही दोनों ने उन्हें आशार्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी गोद हरी हो जाए.
ये बात सुन दोनों बुरी तरह रोने लगीं और उन्होंने महिला को अपने बच्चों के शव दिखाए. ये सब देख शीतला ने दोनों से कहा कि उन्हें उनके कर्मों का फल मिला है. ये बात सुन वो समझ गईं कि शीतला सप्तमी के दिन ताज़ा खाना बनाने की वजह से ऐसा हुआ.
ये सब जान दोनों ने माता शीतला से माफी मांगी और आगे से ऐसा ना करने को कहा. इसके बाद माता ने दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया. इस दिन के बाद से पूरे गांव में शीतला माता का व्रत धूमधाम से मनाए जाने लगा.
गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019
होली होलिका दहन 2019, महत्व, तारीख और मुहुर्त
होली होलिका दहन 2019, तारीख और मुहुर्त
होलिका दहन 20 मार्च 2019 दिन बुधवार को पड़ रहा है. होलिका दहन की में टाइमिंग यानी मुहुर्त का भी बहुत अर्थ होता है. लोग उचित समय पर होलिका दहन करें तो ज्योतिष और वास्तुशास्त्र के अनुसार उसका फायदा बहुत अधिक होता है. इस बार होलिका दहन काफी देर से होगा. सामान्यतया यह शाम 4 बजे के बाद होता है लेकिन इस बार भद्र मुख के कारण होलिका दहन का कार्यक्रम थोड़ी देर से शुरू होगा. मुंबई वासियों और पश्चिम भारत को होलिका दहन के लिए काफी कम समय मिलेगा, जो कि 10 मिनट है. यह 8.57 से शुरू होकर 9.09 तक चलेगा. वहीं दिल्ली और उत्तर भारत में यह 8.57 से शुरू होगा और देर रात 12.28 तक चलेगा.
होली 2019 तारीख और समय
इस बार होली 21 मार्च, 2019 को पड़ रहा है, जो कि दिन गुरूवार को आ रहा है. इस बार होली खेलने का मुहुर्त सुबह 8 बजे से लेकर शाम 3 बजे तक है. इस दौरान पूरे देश भर में होली खेली जाएगी. इस दौरान मथुरा, वृंदावन और बरसाने की होली काफी प्रसिद्ध होती है. देश विदेश सो लोग यहां की लठ्ठमार होली देखने और खेलने आते हैं.
होली होलिका दहन महत्व
होली में होलिका दहन का अपना ही महत्व है. कहा जाता है कि होलिका नाम की एक राजकुमारी को अग्नि के ताप से अप्रभावित होने का वरदान प्राप्त था. लेकिन भगवान विष्णु के एक उपासक प्रहलाद ने अपनी बुआ होलिका के इस घमण्ड को तोड़ दिया था. माना जाता है कि होलिका जब अपने भतीजे के साथ अग्नि में प्रवेश की तो वह जल गईं, जबकि प्रहलाद बच गए. उसके बाद से यह होलिका दहन मनाया जाता है. लोग शाम के वक्त अपने घर के बाहर लकड़ी इकट्ठा करते हैं और उसे जलाते हैं और खुद की बुराईयों को भी जलाने की प्रार्थना करते हैं.
सदस्यता लें
संदेश (Atom)









