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बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

महाशिवरात्रि के चमत्कारी उपाय

महाशिवरात्रि के चमत्कारी उपाय



महाशिवरात्रि भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय है, जो फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ हैं। अत: धार्मिक शास्त्रों में इसे अत्यन्त शुभफलदायी कहा गया है, वैसे तो शिवरात्रि हर माह में ही आती है, परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा गया है, साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों ने से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसीलिए मान्यता है कि जो लोग इस दिन भगवान शंकर की आराधना करते है, वह परम भाग्यशाली बनते है। इस दिन कुछ उपायो को करने से जीवन की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है

जानिए शिवरात्रि के उपाय ,महाशिवरात्रि के चमत्कारी उपाय,महा शिवरात्रि के टोटके 


  •  यदि किसी जातक के विवाह में अड़चन आ रही है तो उसे महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर केसर मिला हुआ मीठा दूध चढ़ाना चाहिए। इससे विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती है उत्तम विवाह के योग बनने लगते है ।

  •  धन लाभ के लिए महाशिवरात्रि के दिन नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाना चाहिए। इससे जीवन में हर्ष उल्लास, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।

  •  शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर एक आँवला अथवा आँवले के मुरब्बे का पीस चढ़ाकर उसके ऊपर शहद चढ़ाएं , इससे भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते है । ऐसा करने से भगवान आशुतोष की कृपा से जीवन में प्रेम, पारिवारिक सहयोग, यश और प्रचुर मात्रा में स्थाई धन सम्पति के योग प्रबल होते है । इस उपाय को प्रत्येक सोमवार को भी अवश्य ही करना चाहिए । 

  •  शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर अनार के फूल चढ़ाकर उसपर शहद चढ़ाएं , इसको करने से उस जातक के जीवन में , घर कारोबार में कभी भी किसी भी प्रकार का आर्थिक संकट नहीं आता है ।

  • अगर कोई व्यक्ति किसी रोग से पीड़ित है तो उसे शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर काले तिल अवश्य ही चढ़ाने चाहिए इससे रोग दूर होते है और जातक को दीर्घायु की प्राप्ति होती है । इस उपाय को शिवरात्रि से शुरू करते हुए प्रत्येक सोमवार को अवश्य ही करना चाहिए । 

  •  शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर अनार के फूल चढ़ाकर उसपर शहद चढ़ाएं , इसको करने से उस जातक के जीवन में , घर कारोबार में कभी भी किसी भी प्रकार का आर्थिक संकट नहीं आता है ।

  • अगर कोई व्यक्ति किसी रोग से पीड़ित है तो उसे शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर काले तिल अवश्य ही चढ़ाने चाहिए । इस उपाय को शिवरात्रि से शुरू करते हुए प्रत्येक सोमवार को अवश्य ही करना चाहिए । 

  •  शिव पुराण कथा के अनुसार शिव ही ऐसे भगवान हैं, जो शीघ्र प्रसन्न होकर अपने सभी भक्तों को मनचाहा वर दे देते हैं। कहते है जो व्यक्ति महाशिवरात्रि का ब्रत रखकर रात्रि में जागरण करता है उसके जीवन में कोई भी संकट नहीं आता है, उसको सभी इच्छित फलो की प्राप्ति होती है । 

  •  यदि आप आर्थिक समस्या से परेशान है तो शिवरात्रि के दिन किसी भी शिव मंदिर में रात भर के लिए घी का दीपक अवश्य ही जलाएं । 

  • ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जो लोग शिवरात्रि में किसी भी शिवलिंग के पास रात भर के लिए दीपक जलाते हैं, उन्हें शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है, उन्हें जीवन में कभी भी धन का संकट नहीं होता है। यह उपाय शिवरात्रि से शुरू करके प्रतिदिन अथवा प्रत्येक सोमवार को अवश्य ही करना चाहिए । 

  •  शिवपुराण के अनुसार शिवरात्रि के दिन ही देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देव ने अपने पिछले जन्म में रात्रि के समय शिवलिंग के पास रोशनी की थी। इसी के पुण्य से उन्हें अगले जन्म में देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद प्राप्त हुआ है।

महाशिवरात्रि पर भूल से भी महादेव को न चढ़ाएं यह चीज़ें

महाशिवरात्रि पर भूल से भी महादेव को न चढ़ाएं यह चीज़ें


भोलेनाथ को देवों के देव यानी महादेव कहलाते है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव ही आदि और अनंत हैं। सभी देवताओं में भगवान शिव ही एक मात्र ऐसे देवता हैं जिनकी लिंग रूप में भी पूजा की जाती है। भगवान भोलेनाथ सचमुच इतने भोले है कि वह जरा सी भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते है ।उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें ऐसी बहुत सी चीजें अर्पित की जाती हैं जो अन्य किसी भी देवता को नहीं चढ़ाई जाती। जैसे आक, बेलपत्र , भांग, धतूरा आदि ।

लेकिन बहुत सी ऐसी वस्तुएँ भी है जो और देवताओं को तो चढाई जाती है परन्तु भगवान आशुतोष की पूजा में उन्हें चढ़ाना पूर्णतया मना है शायद इसीलिए भूलवश या अज्ञानता वश शिव भक्तो को अपनी पूजा का पूर्ण फल नहीं मिल पाता है |

 हिंदु धर्म में शंख को बहुत ही पवित्र माना जाता है और लगभग सभी पूजा के कार्यों में शंख का प्रयोग होता है लेकिन भगवान शिव के शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना वर्जित है, उन्हें कभी भी शंख से जल नहीं चढ़ाना चाहिए ।

 तुलसी भी बहुत पवित्र मानी जाती है और लगभग सभी देवकार्यो में इसका प्रयोग होता है लेकिन तुलसी को भगवान भोलेनाथ पर चढ़ाना मना है |ऐसा बहुत से लोगो को पता ही नहीं है और वह नित्य भगवान शिव की पूजा में उन्हें तुलसी दल अर्पित करते है जिससे उनकी पूजा पूर्ण नहीं होती है।

 धार्मिक कार्यों में कई पूजन कार्य हल्दी के बिना पूर्ण नहीं माने जाते। लेकिन भगवान शिव को हल्दी अर्पित नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हल्दी स्त्री सौंदर्य प्रसाधन में प्रयोग में लायी जाती है और शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुषत्व का प्रतीक है,
इसी वजह से महादेव को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है।

भगवान भोलेनाथ को केतकी और केवड़े के फूल चढ़ाना भी मना है।

 शिवजी की पूजा में बहुत से भक्तजन शिवलिंग पर लोहे या स्टील के लोटे / बर्तन से जल चढ़ाते है जो बिलकुल गलत है ।
भगवान भोलेनाथ पर हमेशा पीतल , कांसे या अष्टधातु के बर्तन / लोटे से ही जल चढ़ाना चाहिए लोहे या स्टील के बर्तन से नहीं ।
 भगवान शिव को सफ़ेद रंग बहुत ही प्रिय है इसीलिए उन्हें यथासंभव सफ़ेद चन्दन से ही तिलक लगाना चाहिए , लाल या पीले चन्दन से नहीं ।
 शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना बेलपत्र के बिना पूरी नहीं होती।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

महाशिवरात्रि 2019- इस बार बन रहा है अनूठा महासंयोग, शिव आराधना का मिलेगा कई गुना ज्यादा फल

महाशिवरात्रि 2019- इस बार बन रहा है अनूठा महासंयोग, शिव आराधना का मिलेगा कई गुना ज्यादा फल



साल 2019 में 4 मार्च को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि पर कई सालों बाद अनूठा संयोग मिल रहा है. फाल्गुन मास में कृष्म पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला महाशिवरात्रि पर्व इस साल सोमवार के दिन आ रहा है. इस दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने पर कई गुना ज्यादा पुण्य लाभ मिलेगा.

सोमवार यानी भगवान शिव का दिन. शिवभक्त इस दिन भोलेनाथ आराधना करते हैं. भोले बाबा के भक्तों के लिए हर साल आने वाली महाशिवरात्रि भी खास महत्व रखती है. शिवभक्त पूरे साल महाशिवरात्रि का इंतजार करते हैं. इस साल की महाशिवरात्रि कुछ खास होने वाली है. साल 2019 में आने वाली महाशिवरात्रि के दिन सोमवार पड़ रहा है. इस महाशिवरात्रि अद्भुत संयोग बन रहा है. हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है. 2019 में 4 मार्च को यह पर्व मनाया जाएगा और सबसे खास बात यह कि इस दिन सोमवार पड़ रहा है.
वैसे तो शिवभक्त हर माह शिवरात्रि मनाते हैं लेकिन साल में फाल्गुन महीने में आने वाली महाशिवरात्रि बहुत खास होती है. देशभर के शिवालयों में इस दिन विशेष महोत्सव होता है पूरे दिन श्रद्धालुओं की भीड़ होती है. लेकिन इस बार महाशिवरात्रि के दिन सोमवार होने से शिवभक्तों में काफी उत्साह है. पंडितों का कहना है कि चार मार्च को महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ की आराधना करने से भक्तों को कई गुना ज्यादा पुण्य लाभ मिलेगा.


माना जाता है कि शिव की आराधना बहुत आसान होती है. भक्त शिवलिंग पर जल और बिल्वपत्र चढ़ाकर भगवान शंकर को खुश कर सकते हैं. लोगों का मानना है कि शिव की आराधना से उनकी हर मनोकामना पूर्ण होती है.

देशभर के शिवालयों में महाशिवरात्रि को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं. काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर, बाबा वैद्यनाथ, केदारनाथ समेत सभी ज्योतिर्लिंगों पर भी महाशिवरात्रि को लेकर तैयारियां की जा रही हैं. महाशिवरात्रि के दिन श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रबंधन के साथ-साथ प्रशासन भी सुरक्षा इंतजाम करने में जुट गया है.

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

शिवरात्रि पर ऐसे करें शिव को प्रसन्न

 शिवरात्रि पर ऐसे करें शिव को प्रसन्न 

शिवरात्रि पर ऐसे करें शिव को प्रसन्न

 
शिवरात्रि के दिन व्रत रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसलिए इस दिन भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत रखने का विधान है। इस दिन सुबह उठकर स्नान कर शिवलिंग पर जलाभिषेक करना चाहिए।
 
शिवरात्रि के दिन शिव को अभिषेक करने का भी विधान है। शिव के अभिषेक में दूध, गुलाब जल, चंदन, दही, शहद, चीनी और पानी जैसी विभिन्न सामग्रियों का प्रयोग करना चाहिए। 
इस दिन शिव के प्रिय चीज बेलपत्र अवश्य ही चढ़ाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दिन शिव को बेलपत्र चढ़ाने से शिव अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।
शिवरात्रि के दिन शिव के प्रिय चीज धतूरे को भी चढ़ाना चाहिए। धतुरा शिव को बहुत प्रिय है।  
 
शिव पुराण के अनुसार शिव का अभिषेक गंगाजल या दूध से करना चाहिए। शिव का अभिषेक करने से शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। 
शिव के अभिषेक में दूध के साथ शहद का भी प्रयोग करना चाहिए।
 
भगवान शिव को बेलपत्र अत्यधिक प्रिय है। इसलिए अभिषेक में बेलपत्र शामिल करना चाहिए। ऐसा माना जाता है बेलपत्र को चढ़ाने से आत्मा की शुद्धि होती है।
इस दिन भगवान शिव को ऋतु फल भी अर्पित करना चाहिए। ऋतु फल के अर्पण से आयु लम्बी होती है।
 
इस दिन शिव को अभिषेक में पान का पत्ता अर्पित कर उत्तम माना गया है। शिव को पान का पत्ता अर्पित करने से संसारिक सुखों की प्राप्ति होती है।
शिव को उनकी पूजा में धूप, दीप आदि का प्रयोग करना कष्टों को दूर करने वाला माना गया है।

महाशिवरात्रि 2019: ये है शिव पूजा के लिए शुभ मुहूर्त, जानिए इसका महत्त्व

महाशिवरात्रि 2019: ये है शिव पूजा के लिए शुभ मुहूर्त, जानिए इसका महत्त्व 

महाशिवरात्रि 2019: ये है शिव पूजा के लिए शुभ मुहूर्त, जानिए इसका महत्त्व


महाशिवरात्रि, हिन्दुओं के महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। जिसे फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में देवों के देव महादेव का पूजन किया जाता है।

अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक, महाशिवरात्रि का पर्व फरवरी या मार्च के महीने में पड़ता है। ऐसे तो हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है। लेकिन उन सभी में फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन व्रत रखने से व्रती की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

भगवान भोले के भक्त महाशिवरात्रि का इंतजार बड़ी बेसब्री से करते हैं। इस दिन प्रातःकाल से ही शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ जुटने लगती है।

ऐसे तो साल की सभी शिवरात्रि में व्रत रखने का महत्व होता है परन्तु उन सभी में महाशिवरात्रि का व्रत रखने का खास महत्व होता है। मान्यता है, अगर सच्चे मन से इस दिन भगवान भोले की पूजा की जाए तो शिव शंकर सभी मनोकानायें पूर्ण करते हैं। इस दिन शिवलिंग पर फूल, बेलपत्र और बेर अर्पित करने का भी खास महत्व होता है।
शिवरात्रि के पावन पर्व में शिव मंदिरों की रौनक खूब दिखती है। प्रातःकाल से ही शिव मंदिरों में भक्तों का तांता जुटने लगता है। और सभी भगवान शिव के मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हैं। इस दिन शिव जी को दूध और जल से अभिषेक कराने की भी प्रथा है।

महाशिवरात्रि 2019 शुभ मुहूर्त

2019 में महाशिवरात्रि 4 मार्च 2019, सोमवार को है। 

निशीथ काल पूजा मुहूर्त = 24:07 से 24:57 बजे। 

शिवरात्रि व्रत पारण समय = 06:46 से 15:26 बजे (5 मार्च 2019, मंगलवार)

चतुर्दशी तिथि आरंभ = 4 मार्च 2019, सोमवार 16:28 बजे। 

चतुर्दशी तिथि समाप्त = 5 मार्च 2019, मंगलवार 19:07 बजे।

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

महाशिवरात्रि की कथा और व्रत विधि

महाशिवरात्रि की कथा और व्रत विधि


महा शिवरात्रि व्रत विधि

भगवान शिव की पूजा-वंदना करने के लिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को व्रत रखा जाता है। लेकिन सबसे बड़ी शिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी होती है। इसे महाशिवरात्रि भी कहा जाता है। वर्ष 2015 में महाशिवरात्रि का व्रत 17 फरवरी को रखा जाएगा।

शिवरात्रि व्रत विधि
गरुड़ पुराण के अनुसार शिवरात्रि से एक दिन पूर्व त्रयोदशी तिथि में शिव जी की पूजा करनी चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके उपरांत चतुर्दशी तिथि को निराहार रहना चाहिए। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को जल चढ़ाने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। 

शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराकर "ऊं नमो नम: शिवाय" मंत्र से पूजा करनी चाहिए। इसके बाद रात्रि के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए और अगले दिन प्रात: काल ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। 

गरुड़ पुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव को बिल्व पत्र अर्पित करना चाहिए। भगवान शिव को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं। शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को रुद्राक्ष, बिल्व पत्र, भांग, शिवलिंग और काशी अतिप्रिय हैं।

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महाशिवरात्रि की कथा

पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। 

शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा। 

बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुँची। 

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया। 

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। 

अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।

तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, 'हे शिकारी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मारो। शिकारी हँसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। 

मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ। 

हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! 

यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।' 

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया। 

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया। 

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए। 

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शिवकथा का संदेश 

शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पण्डित एवं पूजारियों से उत्कृष्ट बना देती है जो कि सिर्फ रात्रि जागरण, उपवास एव दूध, दही, एवं बेल-पत्र आदि द्वारा शिव को प्रसन्न कर लेना चाहते हैं। इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं। 

वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था। इसका अर्थ यह भी हुआ कि वह किसी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है। शिव का अर्थ ही कल्याण होता है। उन निरीह प्राणियों का कल्याण करने के कारण ही वह शिव तत्व को जान पाया तथा उसका शिव से साक्षात्कार हुआ। 

परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है।मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही 'शिवरात्रि' है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।

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