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मंगलवार, 18 सितंबर 2018

卐 श्री गणेश चालीसा 卐

卐 श्री गणेश चालीसा 卐
Shree Ganesh Chalisa in Hindi





॥ दोहा 
जय गणपति सदगुण सदन,
कवि वर बदन कृपाल,
विघ्न हरण मंगल करण,
जय जय गिरिजालाल ।

॥ चौपाई ॥ 
जय जय जय गणपति गणराजू, 
मंगल भरण करण शुभ काजू ।
जै गजबदन सदन सुखदाता, 
विश्व विनायक बुद्धि विधाता ।
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन, 
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ।
राजत मणि मुक्तन उर माला, 
स्वर्ण मुकुट सिर नयन विशाला ।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं , 
मोदक भोग सुगन्धित फूलं ।
सुन्दर पीताम्बर तन साजित , 
चरण पादुका मुनि मन राजित ।
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता , 
गौरी ललन विश्व विख्याता ।
रिद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे , 
मूषक वाहन सोहत द्वारे।
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी , 
अति शुचि पावन मंगलकारी ।

एक समय गिरिराज कुमारी , 
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा , 
तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रुपा ।
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी , 
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी ।
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा , 
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ।
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला , 
बिना गर्भ धारण, यहि काला ।
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना , 
पूजित प्रथम, रुप भगवाना ।
अस कहि अन्तर्धान रुप है , 
पलना पर बालक स्वरुप है ।
बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना, 
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना|
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं , 
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ।
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं , 
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ।
लखि अति आनन्द मंगल साजा , 
देखन भी आये शनि राजा ।
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं , 
बालक, देखन चाहत नाहीं ।
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो , 
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो ।
कहन लगे शनि, मन सकुचाई , 
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ।
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ , 
शनि सों बालक देखन कहाऊ ।
पड़तहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा , 
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ।
गिरिजा गिरीं विकल है धरणी , 
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी ।
हाहाकार मच्यो कैलाशा , 
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ।
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो , 
काटि चक्र सो गज शिर लाये ।
बालक के धड़ ऊपर धारयो , 
प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ।
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे , 
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वन दीन्हे ।
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा , 
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ।
चले षडानन, भरमि भुलाई, 
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई ।
चरण मातुपितु के धर लीन्हें , 
तिनके सात प्रदक्षिणा कीन्हें ।
धनि गणेश कहि शिव हिय हर्ष्यो, 
नभ ते सुरन सुमन बहु वर्षयो।
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई , 
शेष सहसमुख सके न गाई ।
मैं मतिहीन मलीन दुखारी , 
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी ।
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा , 
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा ।
अब प्रभु दया दीन पर कीजै , 
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ।

॥ दोहा ॥ 
श्री गणेश यह चालीसा, 
पाठ करै कर ध्यान, 
नित नव मंगल गृह बसै, 
लहे जगत सनमान।
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, 
ऋषि पंचमी दिनेश, 
पूरण चालीसा भयो, 
मंगल मूर्ति गणेश ।
॥ इति श्री गणेश चालीसा समाप्त् ॥


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