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सोमवार, 26 अगस्त 2019

जानें अजा एकादशी का महत्व, पूजा-विधि और शुभ मुहूर्त

जानें अजा एकादशी का महत्व, पूजा-विधि और शुभ मुहूर्त

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एक साल में 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन मलमास या अधिकमास होने की स्थिति में इनकी संख्या 26 हो जाती है। हिंदू परंपरा में एकादशी को पुण्य कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार यह एकादशी 26 अगस्त दिन सोमवार को है। ऐसा विश्वास है कि इस व्रत को करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इसके व्रत में भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है।

एकादशी का महत्व

पद्म पुराण में बताया है कि जो भी भक्त अजा एकादशी का उपवास सच्चे मन से रखता है और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करता है, उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है और उसके सभी पापों का अंत होता है। उस आत्मा को जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति मिल जाती है। पुराणों में यह भी बताया गया है कि जितना पुण्य कन्यादान, हजारों वर्षों की तपस्या और उससे अधिक पुण्य एकमात्र अजा एकादशी व्रत करने से मिलता है।

एकादशी का शुभ मुहूर्त

अजा एकादशी व्रत = 26 अगस्त को
व्रत का पारण = 27 अगस्त को सूर्योदय के बाद
पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी

व्रत विधि

इस दिन व्रत रखने वाले को प्रात:काल उठकर स्नान वगैरह से निवृत्त होकर सबसे पहले व्रत का संकल्प लेना चाहिए। भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगा जल से स्नान करवाकर गंध, पुष्प, धूप वगैरह समर्पित करें और उनकी आरती करें। भगवान नारायण को तुलसी बहुत प्रिय है, इसलिए उन्हें तुलसीदल भी समर्पित करना चाहिए। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए और दान देना चाहिए।

एकादशी के दिन क्या करें क्या न करें

शास्त्रों व पुराणों का कहना है कि जो व्यक्ति एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें हमेशा सदाचार का पालन करना चाहिए। साथ ही जो व्रत नहीं भी रखते हैं उन्हें भी एकादशी के दिन लहसुन, बैंगन, प्याज, मांस-मदिरा, तंबाकू और पान-सुपारी से परहेज रखना चाहिए। एकादशी का व्रत बहुत पवित्र माना जाता है। व्रत रखने वाले को दशमी तिथि के दिन से ही मन में भगवान विष्णु का ध्यान करें।

शनिवार, 27 जुलाई 2019

कामिका एकादशी का व्रत करते समय बरतें ये सावधानियां

कामिका एकादशी का व्रत करते समय बरतें ये सावधानियां



सावन के महीने में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कामिका एकादशी का व्रत पूजन किया जाता है. इस साल कामिका एकादशी का व्रत 28 जुलाई 2019 को किया जाएगा. कामिका एकादशी के दिन पीले रंग का काफी बड़ा महत्व बताया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा पीले फल-फूल से की जाती है.

सभी एकादशी व्रतों में से कामिका एकादशी को भगवान विष्णु का उत्तम व्रत माना जाता है क्योकि यह भगवान शिव के पावन महीने श्रावण में आता है. कामिका एकादशी का व्रत विधान करके सभी लोग अपने कष्टों से मुक्त हो सकते हैं. यह व्रत रखने से व्यक्ति के मन की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं.

- कामिका एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करके साफ कपड़े पहने.

-घर में प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन का बिल्कुल भी प्रयोग ना करें.

-सुबह और शाम एकादशी की पूजा पाठ में साफ-सुथरे कपड़े पहनकर ही व्रत कथा सुने.

-एकादशी की पूजा में हर तरीके से परिवार में शांति पूर्वक माहौल बनाए रखें.

-कामिका एकादशी पर एक आसन पर बैठकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का 108 बाहर जाप जरूर करें.

कामिका एकादशी 2019 शुभ मुहूर्त ,पूजा विधि ,महत्त्व और व्रत कथा

कामिका एकादशी 2019 शुभ मुहूर्त ,पूजा विधि ,महत्त्व और व्रत कथा 





सावन के महीने में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कामिका एकादशी का व्रत पूजन किया जाता है. इस साल कामिका एकादशी का व्रत 28 जुलाई 2019 को किया जाएगा. कामिका एकादशी के दिन पीले रंग का काफी बड़ा महत्व बताया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा पीले फल-फूल से की जाती है.

सभी एकादशी व्रतों में से कामिका एकादशी को भगवान विष्णु का उत्तम व्रत माना जाता है क्योकि यह भगवान शिव के पावन महीने श्रावण में आता है. कामिका एकादशी का व्रत विधान करके सभी लोग अपने कष्टों से मुक्त हो सकते हैं. यह व्रत रखने से व्यक्ति के मन की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं.

कामिका एकादशी : तिथि व मुहूर्त एवं पारण समय-

कामिका एकादशी व्रत तिथि- 28 जुलाई 2019, रविवार।

एकादशी तिथि का समय- 27 जुलाई 2019 को 19:46 मिनट से प्रारंभ होकर 28 जुलाई 2019 को 18:49 मिनट पर एकादशी तिथि समाप्त होगी।

पारण (व्रत तोड़ने का) समय- 29 जुलाई 2019 को सुबह 05:45 से 08:26 तक रहेगा।

पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय- शाम 17:09 मिनट।

कामिका एकादशी पूजा विधि 

-कामिका एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा उससे एक दिन पहले दशमी तिथि की रात्रि से ही व्रत नियम को लेकर शुरू हो जाती है.

-दशमी तिथि के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन ग्रहण न करें केवल फलों का ही सेवन करें.

-दशमी तिथि की रात को अगर संभव हो तो भगवान विष्णु के किसी भी मंत्र का जाप अवश्य करें.

- सुबह सूर्योदय से पहले उठकर अपने स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लेना चाहिए. पूजा करते समय साफ कपड़े पहनकर विष्णु भगवान का ध्यान करना चाहिए.

- पूर्व दिशा की तरफ एक पटरे पर पीला रेशमी कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की फोटो को स्थापित करें.

-धूप-दीप जलाएं और कलश स्थापित करें.

- भगवान विष्णु को अपने सामर्थ्य के अनुसार फल-फूल, पान, सुपारी, नारियल, लौंग आदि अर्पण करें और स्वयं भी पीले आसन पर बैठ जाएं.

- अपने दाएं हाथ में जल लेकर घर मे धन धान्य की बरकत के लिए भगवान विष्णु के सामने संकल्प लें.

- यदि सम्भव हो तो पूरा दिन निराहार रहकर शाम के समय कामिका एकादशी की व्रत कथा सुनें और फलाहार करें

- शाम के समय भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने एक गाय के घी का दीपक जलाएं

- अब दूसरे दिन सुबह ब्राह्मणों को भोजन कराकर तथा दक्षिणा देकर उसके बाद स्वयं खाना खाना चाहिए |

व्रत कथा

युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि हे प्रभु श्रावण के कृष्ण पक्ष में कौन सी एकादशी होती है. उसका वर्णन करें और कृपा करके उसकी कथा सुनाएं . कृष्ण ने कहा, राजन सुनों मैं तुम्हें कथा सुनाता हूं.

एक नगर में एक ठेठ ठाकुर और एक ब्राह्मण रहते थे. दोनों की एक दूसरे से बनती नहीं थी. आपसी झगड़े के कारण ठाकुर ने ब्राह्मण को मार डाला. इस पर नाराज ब्राह्मणों ने ठाकुर के घर खाना खाने से मना कर दिया. ठाकुर अकेला पड़ गया और वह खुद को दोषी मानने लगा. ठाकुर को अपनी गलती महसूस हुई और उसने एक मुनी से अपने पापों का निवारण करने का तरीका पूजा. इस पर, मुनी ने उन्हें कमिका एकदशी का उपवास करने के लिए कहा. ठाकुर ने ऐसा ही किया. ठाकुर ने व्रत करना शुरू कर दिया. एक दिन कामिका एकादशी के दिन जब ठाकुर भगवान की मूर्ति के निकट सोते हुए एक सपना देखा, भगवान ने उसे बताया, “ठाकुर, सभी पापों को हटा दिया गया है और अब आप ब्राह्मण हटिया के पाप से मुक्त हैं”. इसलिए, इस एकादशी को आध्यात्मिक साधकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह चेतना से सभी नकारात्मकता को नष्ट करता है और मन और हृदय को दिव्य प्रकाश से भर देता है.

कामिका एकादशी व्रत का तीन दिन का नियम होता है. यानी दशमी, एकादशी और द्वादशी को कामिका एकादशी के नियमों का पालन होता है. इन तीन दिनों के दौरान जातकों को चावल नहीं खाने चाहिए. इसके साथ ही लहसुन, प्याज और मसुर की दाल का सेवन वर्जित है. मांस और मदिरा का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिए.

इस बार कामिका एकादशी का व्रत 28 जुलाई, रविवार को किया जाएगा. श्रावण मास में आने के कारण इस व्रत का महत्‍व और बढ़ गया है.

बुधवार, 12 जून 2019

निर्जला एकादशी व्रत में क्या करें, क्या ना करें

निर्जला एकादशी व्रत में क्या करें, क्या ना करें




ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहते है। निर्जला एकादशी का व्रत अन्य सभी एकादशी के व्रत से कठिन होता है क्योंकि इसमें भोजन के साथ-साथ पानी का भी त्याग करना पड़ता हैं। भरी गर्मी में आने वाले इस व्रत में बिना जल के रहना पड़ता है इसलिए इसे निर्जला एकादशी कहते है।चूँकि निर्जला एकादशी का व्रत कठिन है इसलिए इस व्रत का फल भी अधिक है। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहाँ गया है कि विधिपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत करने से अन्य सभी एकादशियों के बराबर फल प्राप्त होता है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा

एक बार जब महर्षि वेदव्यास पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प करा रहे थे। तब महाबली भीम ने उनसे कहा- पितामह। आपने प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या, एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में वृक नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्य व्रत से वंचित रह जाऊंगा?
तब महर्षि वेदव्यास ने भीम से कहा- कुंतीनंदन भीम ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। नि:संदेह तुम इस लोक में सुख, यश और मोक्ष प्राप्त करोगे। यह सुनकर भीमसेन भी निर्जला एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए और समय आने पर यह व्रत पूर्ण भी किया। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
निर्जला एकादशी व्रत में क्या करें-
  • भगवान विष्णु की पूजा करें।
  • किसी भी स्थिति में पाप कर्म से बचें अर्थात पाप न करें।
  • माता पिता और गुरु का चरण स्पर्श करें।
  • श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें।
  • श्री रामरक्ष स्तोत्र का पाठ करें।
  • श्री रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड का पाठ करें।
  • धार्मिक पुस्तक का दान करें।
  • यह महीना गर्मी का होता है इसलिए प्याऊ की व्यवस्था करें।
  • अपने घर की छत पे पानी से भरा पात्र अवश्य रखें।
  • श्री कृष्ण की उपासना करें।
निर्जला एकादशी व्रत में क्या न करें-

  • अन्न किसी कीमत पे ग्रहण न करें।
  • निन्दा न करें।
  • माता पिता और गुरु का अपमान न करें।
  • घर में चावल न पकाएं।
  • गन्दगी मत होने दें।
  • दिन में मत सोएं।

निर्जला एकादशी व्रत 2019 - जानिये शुभ मुहूर्त,पूजा विधि,कथा और दान का महत्त्व

निर्जला एकादशी व्रत 2019 - जानिये शुभ मुहूर्त,पूजा विधि,कथा और दान का महत्त्व


निर्जला एकादशी व्रत मुहूर्त


निर्जला एकादशी पारणा मुहूर्त : 05:22:47 से 08:10:11 तक 14, जून को

अवधि : 2 घंटे 47 मिनट


वर्षभर में चौबीस एकादशी आती हैं। इनमें निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। क्योंकि महर्षि वेदव्यास के अनुसार भीमसेन ने इसे धारण किया था। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से ही साल में आने वाली समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त होता है। इस व्रत में सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल भी न पीने का विधान होने के कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन निर्जल रहकर भगवान विष्णु की आराधना का विधान है। इस व्रत से दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी व्रत पूजा विधि

जो श्रद्धालु वर्षभर की समस्त एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते हैं उन्हें निर्जला एकादशी का उपवास अवश्य करना चाहिए। क्योंकि इस व्रत को रखने से अन्य सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है:

1.  इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है।
2.  एकादशी के दिन प्रात:काल स्नान के बाद सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करें। इसके पश्चात भगवान का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें।
3.  इस दिन भक्ति भाव से कथा सुनना और भगवान का कीर्तन करना चाहिए।
4.  इस दिन व्रती को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफ़ेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है। धार्मिक महत्त्व की दृष्टि से इस व्रत का फल लंबी उम्र, स्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।

निर्जला एकादशी पर दान का महत्व

यह एकादशी व्रत धारण कर यथाशक्ति अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी तथा फल आदि का दान करना चाहिए। इस दिन जल कलश का दान करने वालों श्रद्धालुओं को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाता है तथा सम्पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलता है। श्रद्धापूर्वक जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा


महाभारत काल के समय एक बार पाण्डु पुत्र भीम ने महर्षि वेद व्यास जी से पूछा- ‘’हे परम आदरणीय मुनिवर! मेरे परिवार के सभी लोग एकादशी व्रत करते हैं व मुझे भी व्रत करने के लिए कहते हैं। लेकिन मैं भूख नहीं रह सकता हूं अत: आप मुझे कृपा करके बताएं कि बिना उपवास किए एकादशी का फल कैसे प्राप्त किया जा सकता है।’’

भीम के अनुरोध पर वेद व्यास जी ने कहा- ‘’पुत्र तुम निर्जला एकादशी का व्रत करो, इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन अन्न और जल दोनों का त्याग करना पड़ता है। जो भी मनुष्य एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक बिना पानी पीये रहता है और सच्ची श्रद्धा से निर्जला व्रत का पालन करता है, उसे साल में जितनी एकादशी आती हैं उन सब एकादशी का फल इस एक एकादशी का व्रत करने से मिल जाता है।’’

महर्षि वेद व्यास के वचन सुनकर भीमसेन निर्जला एकादशी व्रत का पालन करने लगे और पाप मुक्त हो गए।

निर्जला एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये 5 गलतियां

निर्जला एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये 5 गलतियां



ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस बार यह 13 जून को है। स्कंद पुराण के अनुसार इस एकादशी पर व्रत करने से सालभर की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य फल मिल जाता है। निर्जला एकादशी के दिन व्रत रखने के साथ ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: का 108 बार जप करने से अक्षय पुण्य मिलता है। इस दिन कुछ काम करने की मनाही होती है, अगर आप इस दिन ये गलतियां करते हैं तो व्रत करने का
पूरा पुण्य खो देते हैं।

1. एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। पूरी रात जागकर भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए। इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

2. एकादशी के दिन पान खाना भी वर्जित माना गया है। पान खाने से मन में रजोगुण की प्रवृत्ति बढ़ती है।

3. इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि इस दिन चावल का सेवन करने वाला पाप का भागी बनता है।

4. चुगली करने से मान-सम्मान में कमी आ सकती है। कई बार अपमान का सामना भी करना पड़ सकता है।

5. एकादशी पर क्रोध भी नहीं करना चाहिए। इससे मानसिक हिंसा होती है।

मंगलवार, 14 मई 2019

15 मई को इस विधि से करें मोहिनी एकादशी व्रत,होगी हर इच्छा पूरी ,जानें शुभ मुहूर्त 2019

15 मई को इस विधि से करें मोहिनी एकादशी व्रत,होगी हर इच्छा पूरी ,जानें शुभ मुहूर्त 2019

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मोहिनी एकादशी वैशाख शुक्ल एकादशी को पड़ती है। वैशाख मास की मोहिनी एकादशी व्रत अन्य एकादशी की तुलना में अधिक पुण्यदायी मानी गई है। साल 2019 में मोहिनी एकादशी 15 मई, बुधवार को मनाई जाएगी। साथ ही इस एकादशी के निमित्त व्रत भी इसी दिन रखा जाएगा। इसके अलावा मोहिनी एकादशी का पारण (व्रत खोलना) 16 मई 2019 को किया जाएगा।

विष्णु पुराण के अनुसार मोहिनी एकादशी का विधिवत व्रत करने से मनुष्य मोह-माया के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही व्रती के समस्त पापों का नाश होता है। मोहिनी एकादशी महत्व मोहिनी एकादशी के विषय में मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद अमृत पाने के लिए दानवों और देवताओं में विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई। दानवों को अमृत प्राप्त करने की प्रबल स्थिति को देखकर भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर दानवों को मोहित कर लिया और उनसे अमृत कलश लेकर देवताओं को सौंप दिया। देवताओं ने इस अमृत का पान कर अजर-अमर हो गए। जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी रूप में प्रकट हुए थे उस दिन वैशाख शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि थी। इसलिए भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के दिन की जाती है।

मोहिनी एकादशी व्रत विधि और नियम 

पुराणों के अनुसार दशमी के दिन संध्या काल में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। एकादशी का व्रत रखने वाले को अपना मन को शांत और स्थिर रखना चाहिए। एकादशी व्रत के दौरान मन में किसी भी प्रकार का द्वेष भाव मन में नहीं रखना चाहिए। क्रोध और दूसरे की निंदा करने से भी बचना चाहिए। मोहिनी एकादशी पूजा विधि भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी, ऋतु फल और तिल का प्रयोग करें। व्रत के दिन अन्न सेवन करना वर्जित है माना गया है। इसलिए व्रत की अवधि में वरती को अन्न ग्रहण से दूर रहना चाहिए।

व्रत में निराहार रहें और शाम में पूजा के बाद फल ग्रहण कर सकते हैं। यदि आप किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत का फल मिलता है। एकादशी के दिन रात्रि जागरण का अत्यधिक महत्व है। संभव हो तो रात में जगकर भगवान का भजन-कीर्तन करें। एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें।

मोहिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त:

मोहिनी एकादशी 14 मई 2019 को दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से शुरू हो जाएगी. 15 मई 2019 को सुबह 10 बजकर 35 मिनट पर एकादशी का शुभ मुहूर्त समाप्त हो जाएगा.

मोहिनी एकादशी के दिन जो भक्त उपवास रखेंगे वो 16 मई को द्वादशी समाप्त होने के समय सुबह 5 बजकर 34 मिनट से लेकर 8 बजकर 15 मिनट के शुभ मुहूर्त पर व्रत का पारण कर सकते हैं.


सोमवार, 29 अप्रैल 2019

सौभाग्य और मोक्ष प्रदान करने वाली वरुथिनी एकादशी 2019- जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा

सौभाग्य और मोक्ष प्रदान करने वाली वरुथिनी एकादशी 2019- जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा

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इस माह वरुथिनी एकादशी है जिसके बारे में माना जाता है कि सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार वरुथिनी एकादशी 30 अप्रैल, मंगलवार को है। जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा।

हिंदू धर्म में एकादशी का बहुत अधिक महत्व है। शास्त्रों के के अनुसार माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से कई गुना अधिक फल मिलता है। इसी तरह इस माह वरुथिनी एकादशी है जिसके बारे में माना जाता है कि सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार वरुथिनी एकादशी 30 अप्रैल, मंगलवार को है।

पद्मपुराण के अनुसार इस एकादशी के बारे में श्री कृष्ण ने कहा है कि इस व्रत को करने से लोक और परलोक में सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही सभी प्रकार के पापों का नाश होता है। साथ ही माना जाता है कि इस व्रत को करने से आपको 10 हजार सालों की तपस्या के बराबर फल मिलता है।

हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार जो इंसान विधि-विधान से एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करता है उसे वर्षों तक तपस्या करने का पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए इस व्रत को जरुर करना चाहिए। इस व्रत से कई पीढियों द्वारा किए गए पाप भी दूर हो जाते है।

इस एकादशी के दिन जो व्यक्ति व्रत रखता है। वह इस दिन प्रात: स्नान करके भगवान को स्मरण करते हुए विधि के साथ पूजा करें और उनकी आरती करनी चाहिए साथ ही उन्हें भोग लगाना चाहिए। इस दिन भगवान नारायण की पूजा का विशेष महत्व होता है। साथ ही ब्राह्मणों तथा गरीबों को भोजन या फिर दान देना चाहिए। यह व्रत बहुत ही फलदायी होता है। इस व्रत को करने से समस्त कामों में आपको सफलता मिलती है। जानिए इसकी पूजा-विधि, और कथा के बारे में।

वरुथिनी एकादशी शुभ मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ: रात 11 बजकर 4 मिनट से

पारण का समय(1 मई): सुबह 6 बजकर 44 मिनट से 8 बजकर 22 मिनट
पारण के दिन द्वादशी तिथि समाप्त (1 मई): 6 बजकर 44 मिनट
एकादशी समाप्त: 1 मई दोपहर 12 बजकर 18 मिनट।

वरुथिनी एकादशी व्रत पूजा विधि

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान का मनन करते हुए सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। इसके बाद सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान करें। इसके बाद पूजा स्थल में जाकर भगवान श्री कृष्ण की पूजा विधि-विधान से करें। इसके लिए धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह चीजों से करने के साथ रात को दीपदान करें। इस दिन रात को सोए नहीं।

सारी रात जगकर भगवान का भजन-कीर्तन करें। इसी साथ भगवान से किसी प्रकार हुआ गलती के लिए क्षमा भी मांगे। अगले दूसरे दिन सुबह पहले की तरह करें। इसके बाद ब्राह्मणों को ससम्मान आमंत्रित करके भोजन कराएं और अपने अनुसार उन्हे भेट और दक्षिणा दे। इसके बाद सभी को प्रसाद देने के बाद खुद भोजन करें। व्रत के दिन व्रत के सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए। इसके साथ ही साथ जहां तक हो सके व्रत के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। भोजन में उसे नमक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इससे आपको हजारों सालों की तपस्या के बराबर फल मिलेगा।

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा

वरुथिनी एकादशी के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक लोकप्रिय कथा राजा मांधाता की है। प्राचीन काल में नर्मदा नदी के किनारे बसे राज्य में मांधाता राज करते थे। वे जंगल में तपस्या कर रहे थे, उसी समय एक भालू आया और उनके पैर खाने लगा। मांधाता तपस्या करते रहे। उन्होंने भालू पर न तो क्रोध किया और न ही हिंसा का सहारा लिया।

पीड़ा असहनीय होने पर उन्होंने भगवान विष्णु से गुहार लगाई। भगवान विष्णु  ने वहां उपस्थित हो उनकी रक्षा की पर भालू द्वारा अपने पैर खा लिए जाने से राजा को बहुत दुख हुआ। भगवान ने उससे कहा- हे वत्स! दुखी मत हो। भालू ने जो तुम्हें काटा था, वह तुम्हारे पूर्व जन्म के बुरे कर्मो का फल था। तुम मथुरा जाओ और वहां जाकर वरुथिनी एकादशी का व्रत रखो। तुम्हारे अंग फिर से वैसे ही हो जाएंगे। राजा ने आज्ञा का पालन किया और फिर से सुंदर अंगों वाला हो गया।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

मोहिनी एकादशी व्रत कथा, महत्त्व और व्रत विधि

मोहिनी एकादशी व्रत कथा, महत्त्व और व्रत विधि

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मोहिनी एकादशी व्रत, वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि, 15 मई 2019,  दिन बुधवार को है यह पाप से मुक्ति दिलाता है। मोहिनी एकादशी व्रत प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि को मनाया जाता है। जो व्यक्ति इस व्रत को करता है वह समस्त मोह बंधन से मुक्त हो जाता है।  वैशाख मास की यह एकादशी श्रेष्ठ मानी गयी है। यही नहीं इस व्रत को करने से जाने अनजाने में किये गए पापाचरण भी शीघ्र ही समाप्त हो जाता है। वस्तुतः मोहिनी एकादशी करने से मनुष्य सभी प्रकार के मोह बन्धनों से मुक्त हो जाता है साथ ही उसके द्वारा कृत्य पाप भी नष्ट हो जाता है परिणामस्वरूप वह मोक्ष को प्राप्त करता है।

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मोहिनी एकादशी व्रत कथा


प्रचलित मोहिनी एकादशी व्रत कथा के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी थी। वहां चन्द्रवंश में उत्पन धृतिमान नामक राजा राज करते थे। उसी नगर में धनपाल नाम का  एक वैश्य भी रहता था जो  धनधान्य से परिपूर्ण और सुखी जीवन यापन कर रहा था।  वह सदा पुन्यकर्म में ही लगा रहता था।  भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहता था। उसके पाँच पुत्र थे। सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत तथा धृष्ट्बुद्धि। धृष्ट्बुद्धि पांचवा पुत्र था। वह  हमसह अकृत्य कामो ( जुआ, चोरी इत्यादि ) में लगा रहता था। वह वेश्याओं  के ऊपर अपने पिता का धन बरबाद किया करता था । एक दिन उसके पिता से यह सब सहन नहीं हो सका और परेशान होकर उसे उसे अपने घर से निकाल दिया इसके बाद इधर-उधर भटकने लगा। इसी क्रम में भूख-प्यास से व्याकुल वह महर्षि कौँन्डिन्य के आश्रम जा पहुँचा और वह मुनिवर कौँन्डिन्य के पास जाकर करबद्ध होकर बोला : भगवन मेरे ऊपर  दया करे मुझे कोई ऐसा मार्ग बताये जिससे मुझे मुक्ति मिल जाए।

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कौँन्डिन्य ऋषि बोले –  वैशाख  मास के शुक्ल पक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्द एकादशी का व्रत करो। ‘मोहिनी’ एकादशी के दिन उपवास करने से प्राणियों के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।’ मुनि का यह वचन सुनकर धृष्ट्बुद्धि का प्रसन्न हो गया और उन्होंने कौँन्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक ‘मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया और  इस व्रत के करने से उसके सभी पाप कर्म करना बंद कर दिया तथा भगवान विष्णु के आशीर्वाद से पाप मुक्त हो गया और स्वर्गलोक में प्रस्थान कर गया। इसलिए यह व्रत अत्यन्त श्रेष्ठ व्रत माना गया है इस व्रत को करने से व्यक्ति का कल्याण होता है।

मोहिनी एकादशी नाम का महत्त्व

मोहिनी एकादशी के विषय में कहा गया है कि समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश पाने के लिए दानवों एवं देवताओं के मध्य जब विवाद हो गया तब  भगवान् विष्णु ने अति सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर दानवों को मोहित कर दिए थे और अमृत कलश लेकर  देवताओं को सारा अमृत पीला दिया था और सभी देवता अमृत पीकर अमर हो गये। कहा जाता है कि जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण किये थे उस दिन वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि थी इसी कारण भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के रूप में की जाती है। यही जो भक्त यह व्रत करता है वह अपने समस्त परेशानियों को मोहिनी रूप धारण कर समाधान करने का सामर्थ्य रखेगा।

मोहिनी एकादशी व्रत विधि


जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी का व्रत करता है उसे एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि की रात्रि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। उस दिन शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले  उठकर नित्य क्रिया से निवृत्य होकर स्नान कर लेना चाहिए। यदि सम्बव हो तो गंगाजल को पानी में डालकर नहाना चाहिए।स्नान करने के लिए कुश और तिल के लेप का प्रयोग करना श्रेष्ठ माना गया है। स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण कर विधिवत भगवान श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
भगवान् विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीप जलाएं तथा पुनः व्रत का संकल्प ले, कलश की स्थापना कर लाल वस्त्र बांध कर कलश की पूजन करें। इसके बाद उसके ऊपर भगवान की प्रतिमा रखें, प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध करके नव वस्त्र पहनाए। उसके बाद पुनः धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए और नैवेध तथा फलों का भोग लगाना चाहिए। फिर प्रसाद का वितरण करे तथा ब्राह्मणों को भोजन तथा दान-दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए। रात्रि में भगवान का भजन कीर्तन करना चाहिए। दूसरे दिन ब्राह्मण भोजन तथा दान के पश्चात ही भोजन ग्रहण करना अच्छा होता है।
एकादशी का व्रत शुद्ध मन से करना चाहिए। मन में किसी प्रकार का पाप विचार नहीं लाना चाहिए। झूठ तो अंजान में भी नहीं बोले तो अच्छा रहेगा।  रखने वाले को अपना मन साफ रखना चाहिए। व्रती को पूरे दिन निराहार रहना चाहिए तथा  शाम में पूजा के बाद फलाहार करना चाहिए।

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

आमलकी एकादशी पर इस विधि से करें विष्‍णु जी की पूजा, मिलेगा संतान सुख

 आमलकी एकादशी पर इस विधि से करें विष्‍णु जी की पूजा, मिलेगा संतान सुख



इस दिन व्रत करके पूजा पाठ करने से विष्णु और लक्ष्मी जी का वरदान प्राप्‍त होता है। इस दिन आंवले के वृक्ष तथा विष्णु लक्ष्मी की पूजा की जाती है। जानें पूजा विधि..

 हर साल चौबीस एकादशियां आती हैं। हिंदू धर्म में कादशी का व्रत बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। 17 मार्च को आमलकी एकादशी मनाई जा रही है। इसे आंवला एकादशी के रूप में मनाते हैं। जिस तरह से शास्त्रों में नदियों में गंगा को पहला स्‍थान प्राप्त है ठीक उसी तरह से आवंले को भी पहला स्‍थान दिया गया है।

इस दिन व्रत करके पूजा पाठ करने से विष्णु और लक्ष्मी जी का वरदान प्राप्‍त होता है। इस दिन आंवले के वृक्ष तथा विष्णु लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इससे आपके बच्चों को जीवन में बड़ा पद प्राप्‍त होगा। भगवान विष्णु ने कहा है जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष में जो पुष्य नक्षत्र में एकादशी आती है उस एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इस एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यहां जानें इसका महत्‍व और पूजा विधि-


आमलकी एकादशी का महत्व

इस दिन व्रत रखने से इंसान की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और वह जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ता है। इस दिन मंदिर भी जाना चाहिए तथा गाय को भोजन करवाना चाहिए। मन, वचन तथा कर्म से किसी को कष्ट मत दें तथा अहिंसा का पालन करें। आप यदि चाहें तो किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु पूजा का संकल्प भी करके इस व्रत को रख सकते हैं।



आमलकी एकादशी की पूजा विधि-

एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धन्य रखकर मिट्टी का कलश स्थापित करते हैं।
पूजास्थल पर ही विष्णु जी की मूर्ति स्थापित करें। अब श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें। पूरी रात्रि सामूहिक भगवान के नाम का संकीर्तन करें।
भजन करें। इस दिन भगवान विष्णु का श्रृंगार भी कर सकते हैं।
श्री रामचरितमानस का पाठ करना भी शुभ फलदायी है।
व्रत रखकर अगले दिन शुभ मुहूर्त में ब्राम्हणों को भोजन कराके तथा दान करके खुद भोजन करके व्रत का पारण करते हैं।
एकादशी के व्रत में घर में चावल नहीं बनना चाहिए तथा घर का वातावरण पूरा सात्विक हो। श्रद्धा तथा समर्पण पूर्वक व्रत तथा पूजा से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति करवाते हैं।

* आमलकी एकादशी एकादशी व्रत कथा *

* आमलकी एकादशी एकादशी व्रत कथा *

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एक बार एक नगर था. इस नगर में सभी वर्गों के लोग मिलकर आनन्द पूर्वक रह्ते थें. लोगों का आपस में प्रेम होने के कारण धर्म और आस्था का निवास भी नगर में बना हुआ था. यह नगर चन्द्रवंशी नामक राजा के राज्य के अन्तर्गत आता था. उस राज्य में सभी सुखी थे, उस राज्य में विशेष रुप से श्री विष्णु जी की पूजा होती थी. और एकदशी व्रत करने की प्रथा उस नगर में प्राचीन समय से चली आ रही थी. राजा और प्रजा दोनों मिलकर एकादशी व्रत कुम्भ स्थापना करते थे. कुम्भ स्थापना के बाद धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से पूजा की जाती थी.

एक बार एकादशी व्रत करने के समय सभी जन मंदिर में जागरण कर रहे थे. रात्रि के समय एक शिकारी आया जो भूखा था, और वह लगभग सभी पापों का भागी था. मंदिर में अधिक लोग होने के कारण शिकारी को भोजन चुराने का अवसर न मिल सका और उस शिकारी को वह रात्रि जागरण करते हुए बितानी पडी. प्रात:काल होने पर सब जन अपने घर चले गए. और शिकारी भी अपने घर चला गया. कुछ समय बीतने के बाद शिकारी कि किसी कारणवश मृ्त्यु हो गई.

उस शिकारी ने अनजाने में ही सही क्योकि आमलकी एकादशी व्रत किया था, इस वजह से उसे पुन्य प्राप्त हुआ, और उसका जन्म एक राजा के यहां हुआ. वह बहुत वीर, धार्मिक, सत्यवा दी और विष्णु भक्त था. दान कार्यो में उसकी रुचि थी. एक बार वह शिकार को गया और डाकूओं के चंगुल में फंस गया. डाकू उसे मारने के लिए शस्त्र का प्रहार करने लगे. राजा ने देखा की डाकूओं के प्रहार का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है.

और कुछ ऎसा हुआ की डाकूओं के शस्त्र स्वंय डाकूओं पर ही वार करने लगे. उस समय एक शक्ति प्रकट हुई, और उस शक्ति ने सभी डाकूओं को मृ्त्यु लोक पहुंचा दिया. राजा ने पूछा की इस प्रकार मेरी रक्षा करने वाला कौन है.? इसके जवाब में भविष्यवाणी हुई की तेरी रक्षा श्री विष्णु जी कर रहे है. यह कृ्पा आपके आमलकी एकादशी व्रत करने के प्रभावस्वरुप हुई है. इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

सोमवार, 28 जनवरी 2019

जया एकादशी व्रत पूजा विधि और कथा

जया एकादशी व्रत पूजा विधि और कथा

जया एकादशी व्रत पूजा विधि और कथा

माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी मनाई जाती है। जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। माना जाता है जया एकादशी का व्रत करना और विधिवत पूजा करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। और व्रती को भूत, प्रेत, पिशाच जैसी योनियों में जानें का भी नहीं रहता। जया एकादशी का व्रत करने से परम् मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जया एकादशी व्रत पूजा विधि

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और वंदना की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:
1.  जया एकादशी व्रत के लिए उपासक को व्रत से पूर्व दशमी के दिन एक ही समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रती को संयमित और ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए।
2.  प्रात:काल स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर धूप, दीप, फल और पंचामृत आदि अर्पित करके भगवान विष्णु के श्री कृष्ण अवतार की पूजा करनी चाहिए।
3.  रात्रि में जागरण कर श्री हरि के नाम के भजन करना चाहिए। 
4.  द्वादशी के दिन किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिये।

जया एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युद्धिष्ठिर के आग्रह पर जया एकादशी व्रत के महत्व और कथा का वर्णन किया। इस कथा के अनुसार:
इंद्र की सभा में उत्सव चल रहा था। देवगण, संत, दिव्य पुरूष सभी उत्सव में उपस्थित थे। उस समय गंधर्व गीत गा रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थीं। इन्हीं गंधर्वों में एक माल्यवान नाम का गंधर्व भी था जो बहुत ही सुरीला गाता था। जितनी सुरीली उसकी आवाज़ थी उतना ही सुंदर रूप था। उधर गंधर्व कन्याओं में एक सुंदर पुष्यवती नामक नृत्यांगना भी थी। पुष्यवती और माल्यवान एक-दूसरे को देखकर सुध-बुध खो बैठते हैं और अपनी लय व ताल से भटक जाते हैं। उनके इस कृत्य से देवराज इंद्र नाराज़ हो जाते हैं और उन्हें श्राप देते हैं कि स्वर्ग से वंचित होकर मृत्यु लोक में पिशाचों सा जीवन भोगोगे।
श्राप के प्रभाव से वे दोनों प्रेत योनि में चले गए और दुख भोगने लगे। पिशाची जीवन बहुत ही कष्टदायक था। दोनों बहुत दुखी थे। एक समय माघ मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन था। पूरे दिन में दोनों ने सिर्फ एक बार ही फलाहार किया था। रात्रि में भगवान से प्रार्थना कर अपने किये पर पश्चाताप भी कर रहे थे। इसके बाद सुबह तक दोनों की मृत्यु हो गई। अंजाने में ही सही लेकिन उन्होंने एकादशी का उपवास किया और इसके प्रभाव से उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई और वे पुन: स्वर्ग लोक चले गए।






शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

षट्तिला एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि

षट्तिला एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि


* षट्तिला एकादशी व्रत कथा * 

नारद मुनि त्रिलोक भ्रमण करते हुए भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ पहुंचे. वहां पहुंच कर उन्होंने वैकुण्ठ पति को प्रणाम करके उनसे अपनी जिज्ञास व्यक्त करते हुए प्रश्न किया कि प्रभु षट्तिला एकादशी की क्या कथा हैऔर इस एकादशी को करने से कैसा पुण्य मिलता है.

देवर्षि द्वारा विनित भाव से इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर लक्ष्मीपति भगवान विष्णु ने कहा प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी. ब्राह्मणी मुझमें बहुत ही श्रद्धा एवं भक्ति रखती थी. यह स्त्री मेरे निमित्त सभी व्रत रखती थी. एक बार इसने एक महीने तक व्रत रखकर मेरी आराधना की. व्रत के प्रभाव से स्त्री का शरीर तो शुद्ध तो हो गया परंतु यह स्त्री कभी ब्राह्मण एवं देवताओं के निमित्त अन्न दान नहीं करती थी अत: मैंने सोचा कि यह स्त्री बैकुण्ड में रहकर भी अतृप्त रहेगी अत: मैं स्वयं एक दिन भिक्षा लेने पहुंच गया.

स्त्री से जब मैंने भिक्षा की याचना की तब उसने एक मिट्टी का पिण्ड उठाकर मेरे हाथों पर रख दिया. मैं वह पिण्ड लेकर अपने धाम लट आया. कुछ दिनों पश्चात वह स्त्री भी देह त्याग कर मेरे लोक में आ गयी. यहां उसे एक कुटिया और आम का पेड़ मिला. खाली कुटिया को देखकर वह स्त्री घबराकर मेरे समीप आई और बोली की मैं तो धर्मपरायण हूं फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली है. तब मैंने उसे बताया कि यह अन्नदान नहीं करने तथा मुझे मिट्टी का पिण्ड देने से हुआ है.

मैंने फिर उस स्त्री से बताया कि जब देव कन्याएं आपसे मिलने आएं तब आप अपना द्वार तभी खोलना जब वे आपको षट्तिला एकादशी के व्रत का विधान बताएं. स्त्री ने ऐसा ही किया और जिन विधियों को देवकन्या ने कहा था उस विधि से ब्रह्मणी ने षट्तिला एकादशी का व्रत किया. व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया अन्न धन से भर गयी. इसलिए हे नारद इस बात को सत्य मानों कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है और तिल एवं अन्न दान करता है उसे मुक्ति और वैभव की प्राप्ति होती है.

*षट्तिला एकादशी व्रत पूजा विधि*

कथा के पश्चात इस एकादशी का जो व्रत विधान है वह जानते हैं. व्रत विधान के विषय में जो पुलस्य ऋषि ने दलभ्य ऋषि को बताया वह यहां प्रस्तुत है. ऋषि कहते हैं माघ का महीना पवित्र और पावन होता है इस मास में व्रत और तप का बड़ा ही महत्व है. इस माह में कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को षट्तिला कहते हैं.

षट्तिला एकादशी के दिन मनुष्य को भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखना चाहिए. व्रत करने वालों को गंध, पुष्प, धूप दीप, ताम्बूल सहित विष्णु भगवान की षोड्षोपचार से पूजन करना चाहिए. उड़द और तिल मिश्रित खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाना चाहिए. रात्रि के समय तिल से 108 बार ॐ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा इस मंत्र से हवन करना चाहिए.

इस व्रत में तिल का छ: रूप में दान करना उत्तम फलदायी होता है. जो व्यक्ति जितने रूपों में तिल का दान करता है उसे उतने हज़ार वर्ष स्वर्ग में स्थान प्राप्त होता है. ऋषिवर ने जिन 6 प्रकार के तिल दान की बात कही है वह इस प्रकार हैं 
1. तिल मिश्रित जल से स्नान 
2. तिल का उबटन 
3. तिल का तिलक 
4. तिल मिश्रित जल का सेवन 
5. तिल का भोजन 
6. तिल से हवन. 
इन चीजों का स्वयं भी प्रयोग करें और किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को बुलाकर उन्हें भी इन चीज़ों का दान दें.

इस प्रकार जो षट्तिला एकादशी का व्रत रखते हैं भगवान उनको अज्ञानता पूर्वक किये गये सभी अपराधों से मुक्त कर देते हैं और पुण्य दान देकर स्वर्ग में स्थान प्रदान करते हैं. इस कथन को सत्य मानकर जो भग्वत् भक्त यह व्रत करता हैं उनका निश्चित ही प्रभु उद्धार करते हैं.

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

निर्जला एकादशी व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत कथा


* ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी भीमसेनी/ पांडव एकादशी व्रत कथा/ निर्जला एकादशी व्रत कथा  * 

भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।

इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूं कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूं, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है। 

अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। 

व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और कांपकर कहने लगे कि अब क्या करूं? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हां वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूं। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है। 

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशीका व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है। 

यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।

व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।

इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूं, दूसरे दिन भोजन करूंगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूंगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएं। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढंक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।

जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए।

वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी नाम से भी जाना जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा और व्रत पूजा विधि

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा


मोक्षदा एकादशी व्रत कथा 

भगवान कहते हैं इस एकादशी का एक दिन का पुण्य प्राणी को नरक से मुक्ति प्रदान करने वाला है। इस संदर्भ में लीलाधारी श्रीकृष्ण ने जो कथा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनायी वह यहां उल्लेख करने योग्य है। भगवान कहते हैं एक थे राजा वैखानस उनके राज्य में सभी सुख शांति से रहते थे। योगी, मुनी, सिद्ध संत सहित सभी जीव जन्तु बिना किसी भय के अपने अपने कर्म किया करते थे। इस प्रजापालक राजा ने एक रात स्वप्न में देखा कि पिता नर्क की यातनाएं भोग रहे हैं। राजा अपने पिता की यह दशा देखकर बेचैन हो उठा और सारी रात फिर सो नहीं सक। सुबह क्षितिज पर सूर्य की लालिमा दिखते ही वह ज्ञानी पंडितों के पास पहुचा और जो कुछ स्वप्न में देखा था कह सुनाया।

राजा की बातें सुनकर पंडितों ने उन्हें त्रिकालदर्शी ऋषि पर्वत के पास जाने की सलाह दी। राजा पर्वत की कुटिया में जा पहुंचा और विनम्रता पूर्वक उनसे अपनी समस्या कह डाली। राजा की अधीरता और बेचैनी को देखकर महाज्ञानी पर्वत ने उन्हें बताया कि आपके पिता अपनी एक ग़लती की सजा भोग रहे हैं। उन्हें नर्क से मुक्त कराने के लिए आपको मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी मोक्षदा एकदशी करनी चाहिए। इस एकादशी का पुण्य आप अपने पिता को देवें तो आपके पिता नर्क से छूट सकते हैं। राजा ने विधि पूर्वक एकादशी का व्रत किया और प्राप्त पुण्य को पिता को अर्पित कर दिया। राजा वैखानस के पिता इस पुण्य से नर्क से मुक्त हो गये और स्वर्ग में उन्हें स्थान प्राप्त हुआ।

* मोक्षदा एकादशी व्रत पूजा विधि *

मोक्षदा एकादशी का व्रत किस प्रकार करना चाहिए इसके विषय में श्री कृष्ण कहते हैं। दशमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और शुद्ध मन से भगवान दामोदर का नाम स्मरण करते हुए सो जाना चाहिए।
सुबह ब्रह्म मुर्हूर्त मे उठकर स्नान करें। भगवान की प्रसन्नता के लिए धूप, दीप, तिल, तुलसी की मंजरी, पंचामृत से लक्ष्मी पति श्री विष्णु की पूजा करें। 
पूजा के पश्चात विष्णु के अवतारों एवं उनकी कथाओं का श्रवण या पाठ करें। रात्रि जागरण कर भगवान विष्णु का भजन गायें। द्वादशी के दिन अपने सामर्थ्य के अनुसार पंडितों को भोजन कराएं व दक्षिणा सहित उन्हें विदा करें। 
अब आप स्वयं अन्न जल ग्रहण करें। इस प्रकार मोक्षदा एकादशी करने से जो पुण्य की प्राप्ति होती है वह वाजपेय यज्ञ से भी अधिक पुण्य देने वाला है।

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