//1?1:2}function urlMod(){var e=window.location.pathname;"p"===e.substring(1,2)?(e=(e=e.substring(e.indexOf("/",1)+1)).substr(0,e.indexOf(".html")),history.replaceState(null,null,"../"+e)):(e=(e=postsDatePrefix?e.substring(1):e.substring(e.indexOf("/",7)+1)).substr(0,e.indexOf(".html")),history.replaceState(null,null,"../../"+e))}function urlSearch(e,t){var n=e+".html";t.forEach(function(e){-1!==e.search(n)&&(window.location=e)})}function urlManager(){var e=urlVal();0===e?accessOnly||urlMod():1===e?getJSON(postsOrPages[feedPriority],1):2===e&&(accessOnly||history.replaceState(null,null,"/"))}function getJSON(e,t){var n=document.createElement("script");if(useApiV3){var o="https://www.googleapis.com/blogger/v3/blogs/"+blogId+"/"+e+"?key="+apiKey+"#maxResults=500#fields=nextPageToken%2Citems(url)#callback=bloggerJSON";nextPageToken&&(o+="#pageToken="+nextPageToken),nextPageToken=void 0}else o=window.location.protocol+"//"+window.location.hostname+"/feeds/"+e+"/default?start-index="+t+"#max-results=150#orderby=published#alt=json-in-script#callback=bloggerJSON";o=o.replace(/#/g,amp),n.type="text/javascript",n.src=o,document.getElementsByTagName("head")[0].appendChild(n)}function bloggerJSON(e){var t=[];if(useApiV3||void 0===urlTotal&&(urlTotal=parseInt(e.feed.openSearch$totalResults.$t)),useApiV3){try{e.items.forEach(function(e,n){t.push(e.url)})}catch(e){}nextPageToken=e.nextPageToken}else try{e.feed.entry.forEach(function(n,o){var r=e.feed.entry[o];r.link.forEach(function(e,n){"alternate"===r.link[n].rel&&t.push(r.link[n].href)})})}catch(e){}urlSearch(window.location.pathname,t),urlTotal>150?(jsonIndex+=150,urlTotal-=150,getJSON(postsOrPages[feedPriority],jsonIndex)):nextPageToken?getJSON(postsOrPages[feedPriority]):secondRequest&&(nextPageToken=void 0,urlTotal=void 0,jsonIndex=1,secondRequest=!1,0===feedPriority?(feedPriority=1,getJSON("posts",1)):1===feedPriority&&(feedPriority=0,getJSON("pages",1)))}function bloggerJS(e){e&&(feedPriority=e),urlManager()}bloggerJS(); //]]> नवरात्री का नौवां दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा विधि,कथा,आरती और मंत्र - Vrat Aur Tyohar
LATEST POSTS

रविवार, 14 अप्रैल 2019

नवरात्री का नौवां दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा विधि,कथा,आरती और मंत्र

नवरात्री का नौवां दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा विधि,कथा,आरती और मंत्र



माँ सिद्धिदात्री की कथा

नवरात्रि का नवां दिन मां सिद्धिदात्री का है जिनकी आराधना से व्यक्ति को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है उसे बरे कर्मों से लडऩे की शक्ति मिलती है। मां सिद्धिदात्री की आराधना से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

कमल के आसन पर विराजमान मां सिद्धिदात्री के हाथों में कमल, शंख गदा, सुदर्शन चक्र है जो हमें बुरा आचरण छोड़ सदकर्म का मार्ग दिखाता है। आज के दिन मां की आराधना करने से भक्तों को यश, बल व धन की प्राप्ति होती है।

मां सिद्धिदात्री का नौंवा स्वरूप हमारे शुभ तत्वों की वृद्धि करते हुए हमें दिव्यता का आभास कराता है। मां की स्तुति हमारी अंतरात्मा को दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण करती है हमें सत्कर्म करने की प्रेरणा देती है। मां की शक्ति से हमारे भीतर ऐसी शक्ति का संचार होता है जिससे हम तृष्णा व वासनाओं को नियंत्रित करके में सफल रहते हैं तथा जीवन में संतुष्टिi की अनुभूति कराते हैं।

मां का दैदीप्यमान स्वरूप हमारी सुषुप्त मानसिक शक्तियों को जागृत करते हुए हमें पर नियंत्रिण करने की शक्ति व सामथ्र्य प्रदान करता है। आज के दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप की उपासना हमारी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाए, असंतोष, आलस्य, ईष्र्या, परदोषदर्शन, प्रतिशोध आदि दुर्भावनाओं व दुर्बलताओं का समूल नाश करते हुए सदगुणों का विकास करती है।

मां के आर्शीवाद से ही हमारे भीतर सतत क्रियाशीलता उत्पन्न होती है जिससे हम कठिन से कठिन मार्ग पर भी सहजता से आगे बढ़ते जाते हैं। मां दुर्गा की नावों शक्तियों का नाम सिद्धिदात्री है. ये अष्टसिद्धियां प्रदान करने वाली देवी है देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं शक्ति स्वरूपा देवी की उपासना करके सभी शक्तियां प्राप्त की थीं जिसके प्रभाव से शिव का आधा शरीर स्त्री का हो गया था। शिवजी का यह स्वरूप अर्धनारीश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मां सिद्धिदात्री सिंहवाहिनी, चतुर्भुज तथा सर्वदा प्रसन्नवंदना है। देवी सिद्धिदात्री की पूजा के लिए नवाहन का प्रसाद, नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल अदि का अर्पण किया जाता है।

इस तरह नवरात्र के नवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना करने वाले भक्तों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की होती है। सिद्धिदात्री को देवी सरस्वती का भी स्वरूप कहा जाता है जो श्वेत वस्त्र धारण किए भक्तों का ज्ञान देती है।

मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करना चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

हिन्दू धर्म के पुराणों में बताया गया है कि देवी सिद्धिदात्री के चार हाथ है जिनमें वह शंख, गदा, कमल का फूल तथा चक्र धारण करे रहती हैं। यह कमल पर विराजमान रहती हैं। इनके गले में सफेद फूलों की माला तथा माथे पर तेज रहता है। इनका वाहन सिंह है। देवीपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवी की शक्तियों और महिमाओं का बखान किया गया है।

माँ सिद्धिदात्री की पूजा विधि

दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है। यह नौ दुर्गा आराधना का अंतिम दिन भी होता है तो इस दिन माता सिद्धिदात्री के बाद अन्य देवताओं की भी पूजा की जाती है। सर्वप्रथम माता जी की चौकी पर सिद्धिदात्री माँ की तस्वीर या मूर्ति रख इनकी आरती और हवन किया जाता है। हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए। बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए।

दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत: सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है। देवी के बीज मंत्र “ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार हवि दें। भगवान शंकर और ब्रह्मा जी की पूजा पश्चात अंत में इनके नाम से हवि देकर आरती करनी चाहिए। हवन में जो भी प्रसाद चढ़ाया है जाता है उसे समस्त लोगों में बांटना चाहिए।

इस दिन माता सिद्धिदात्री को नवाह्न प्रसाद, नवरस युक्त भोजन, नौ प्रकार के पुष्प और नौ प्रकार के ही फल अर्पित करने चाहिए। इस दिन नौ कन्याओं को घर में भोग लगाना चाहिए। नव-दुर्गाओं में सिद्धिदात्री अंतिम है तथा इनकी पूजा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। कन्याओं की आयु दो वर्ष से ऊपर और 10 वर्ष तक होनी चाहिए और इनकी संख्या कम से कम 9 तो होनी ही चाहिए। यदि 9 से ज्यादा कन्या भोज पर आ रही है तो कोई आपत्ति नहीं है।

इस तरह से की गई पूजा से माता अपने भक्तों पर तुरंत प्रसन्न होती है। भक्तों को संसार में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन भक्तों को अपना सारा ध्यान निर्वाण चक्र की ओर लगाना चाहिए। यह चक्र हमारे कपाल के मध्य में स्थित होता है। ऐसा करने से भक्तों को माता सिद्धिदात्री की कृपा से उनके निर्वाण चक्र में उपस्थित शक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।

माँ सिद्धिदात्री की आरती


जय सिद्धिदात्री मां तू सिद्धि की दाता ।
तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता ।।

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि ।
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि ।।

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम ।
जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम ।।

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है ।
तू जगदंबे दाती तू सर्व सिद्धि है ।।

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो ।
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो ।।

तू सब काज उसके करती है पूरे ।
कभी काम उसके रहे ना अधूरे ।।

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया ।
रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया ।।

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली ।
जो है तेरे दर का ही अंबे सवाली ।।

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा ।
महा नंदा मंदिर में है वास तेरा ।।

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता ।
भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता ।।

माँ सिद्धिदात्री का मंत्र

सिद्धगन्‍धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।

शुभ रंग : बैगनी, जामुनी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Slider (Need Documentation)

 
Copyright © 2019 Vrat Aur Tyohar. | All Rights Reserved '>